Last Update : 30-Oct-2017,19:57:18

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Press Note Day 7

30-Oct-2017,19:57:18,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

वसुधैव कुटुम्बकम लोकतन्त्र का आधार है- सुश्री मीनाक्षी नटराजन

उज्जैन। भारतीय दर्शन में वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव प्रमुखता से है। वास्तव में वसुधैव कुटुम्बकम् ही लोकतंत्र का मजबूत आधार है। हमारें वेदों और उपनिषेदों में प्रत्येक संस्कृति को समाहित करने की बात कहीं गई है। जिस प्रकार नमक के पानी में घुल जाने के पश्चात् दुनिया की कोई भी विज्ञान प्रयोगशाला यह भेद नहीं कर सकती है कि नमक का कौन-सा कण पानी की किस बूँद से मिला है, उसी प्रकार हमें भी सभी के विचारों को एक मत में इस प्रकार समाहित करना चाहिए कि विचारों का भेद समाप्त हो जाए। यहीं भाव वसुधैव कुटुम्बकम् है। वर्तमान समाज में मनुष्यों के भीतर तो इतनी पाश्विकता व्याप्त हो चुकी है, कि इतनी पाश्विकता तो पशुओं में भी नहीं होगी। पशु जाति में तो लड़ाई सिर्फ पेट के लिए होती है किन्तु मनुष्यां में तो स्वार्थ पूर्ति की लड़ाईयाँ हो रही है। हमारी धरती तो जय जगत की धरती है। हमें इसके महत्व को समझते हुए आपसी द्वेष, वैमनस्य, हिंसा के भाव को त्याग कर सभी के प्रति सम्मान का भाव जागृत करना चाहिए। वसुधैव कुटुम्बकम् का ऐसा समाज निश्चित रूप से प्रेम, स्नेह और सौहाद्र से ओत-प्रोत होगा। यह भाव हमें रखना होगा कि ईश्वर का निवास प्रत्येक जीव में है और जीवों में कोई बड़े या छोटे का भेद-भाव नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् में भय का कोई स्थान नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् तो सिर्फ प्रेम और करूणा के माध्यम से लाया जा सकता है। हम सब मिलकर यह प्रण करे कि आज विचारों से व्यक्त वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव को हम सिर्फ अपने आचरण में लायेगे बल्कि जन-जन तक भारतीय संस्कृति के इस मूल मंत्र को पहुंचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। उक्त विचार  ख्यात राजनीतिज्ञ सुश्री मीनाक्षी नटराजन ने ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम ही भारतीय समाज का आधार है’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विद्युत्प्रभा जी .सा. ने ‘‘नारी अपने गौरव को पहंचाने’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नारी ने अपने आचरण से ऊँचाईयों को प्राप्त किया है। जब हम नारी की तुलना पुरूष के कार्यां से करते है तो ऐसा करते वक्त वास्तव में नारी के महत्व को पुरूष से कम आंकते है। हमें नारी को नारी के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए। नारी की तुलना यदि करना ही हो तो वह सिर्फ धरती से ही की जा सकती। नारी में वह शक्ति है जो अपने व्यवहार से संसार को स्वर्ग बना सकती है। नारी ही है, जो परिवार को एकजुट करके रखती है।

                समारोह के विशिष्ट वक्ता सांई फाउण्डेषन इंडिया के अध्यक्ष श्री के.पी. डोंगरे ने ‘‘मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिग्री तो हमें महाविद्यालयों से मिल जाती है किन्तु सच्चे मूल्य हमें परिवार द्वारा दिये गए संस्कार से ही प्राप्त होते है। सेवा, त्याग, धर्म, प्रेम जैसे गुणां का समावेश माँ द्वारा ही बच्चों में किया जाता है। संयुक्त परिवारों में ही भारतीय जीवन मूल्यों की आत्मा बसती है। हमें परिवारों का विघटन नहीं होने देना चाहिए। हमे दिमाग का उपयोग करके चांद पर पहुंच सकते है, किन्तु जीवन मूल्य मजबूत होना बहुत आवश्यक है और ऐसे महान मूल्यों का युवा पीढ़ी में कायम रखना हमारे द्वारा दी गई एवं शैक्षणिक संस्थाओं में दी गई शिक्षाओं का मूल दायित्व होना चाहिए।

                समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे।

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री महेशचन्द्र सोनी, श्रीमती चमेली देवी पटेरिया, श्री राधेश्याम दुबे, श्री ब्रजेन्द्र द्विवेदी, उमाशंकर मिश्रा, श्रीमती चन्द्रकला नाटानी, श्रीमती नुसरत खान, ने किया।

                                संचालन डॉ. नीलम महाडिक ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 6

29-Oct-2017,20:05:13,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सिक्ख पंथ की बुनियाद ही सद्भावना है - डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा

उज्जैन। सिक्ख पंथ संस्थापक गुरूनानक देव जी स्वयं सद्भावना के संत थे। उनका उद्देष्य किसी पंथ को स्थापित करने का नहीं था किन्तु उनके विचारों और आदर्षो से प्रभावित होकर विभिन्न धर्मो के लोग उनसे जुड़ते गए और इस प्रकार सिक्ख पंथ की बुनियाद रखी गई अर्थात् सिक्ख पंथ की बुनियाद ही अपने आप में एक सद्भावना है। गुरूनानक देव जी का मानना था कि ईश्वर एक है, शाष्वत है, सत्य है। ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग गुरू से ही संभव है। इसलिए सिक्ख पंथ में गुरू द्वारा और गुरूवाणी का महत्व है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर अपने आप में सद्भावना का प्रतीक है। सिक्ख पंथ ने हमेषा वासुधैव कुटुम्बकम पर विष्वास किया है। सिक्ख पंथ के अनुयायियों ने कई बावड़ियों का निर्माण कराया है। यह भी समाज में सद्भावना कायम करने के लिए ही था क्योंकि नदियों के घाट तो भेद-भाव उत्पन्न कर सकते है किन्तु बावड़ियों में घाट नहीं होते हैं और वहां सभी लोग एक साथ मिलकर पानी का उपयोग कर सकते है। सिक्ख पंथ के दो प्रमुख आदर्ष सेवा और सिमरन है किन्तु इनके प्रचार -प्रसार और प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। गुरूगं्रथ साहब अपनेआप में सद्भावना का एक बड़ा उदाहरण है जिसमें छः गुरूओं की वाणी सहित हिन्दु, मुस्लिम, क्षत्रिय सहित कई धर्मां के सतों की वाणी समाहित हैं। संगत और पंगत ये सिक्ख पंथ के दो आदर्श हैं और इनके मूल में भी सद्भावना का भाव कायम है। संगत का अर्थ होता है -साथ सिक्ख पंथ में एक साथ रहने के लिए धर्मशालाओं का संचालन होता हैं और पंगत का अर्थ होता है - एक साथ बैठकर भोजन प्रसाद ग्रहण करना। इस हेतु सिक्ख पंथ में लंगर का संचालन होता है। विचार कीजिए जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं तो परिवार के मुखियां को खुषी होती हैं और यदि हजारों लोग एक साथ बैठकर भोजन प्रसादी ग्रहण करते है तो ईष्वर को कितनी खुषी होगी? यहीं सिक्ख पंथ के प्रत्येक अनुयायी में होता है। मनुष्य का शरीर पंच तत्वों से बना है। जब प्रकृति ने सभी लोगों में इन पंच तत्वों का अनुपात एक समान रखा है तो फिर हम मनुष्यों में भेद करने वाले कौन होते है? सभी जातियां, बंधनों से ऊपर उठकर मनुष्य की मनुष्य के प्रति सद्भावना कायम हो। उक्त विचार ख्यात साहित्यकार डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा ने ‘‘सिक्ख पंथ और सद्भावना’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के छटे दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए मध्यप्रदेश  के पूर्व महाधिवक्ता  श्री आनन्द मोहन माथुर  ने ‘‘वर्तमान संदर्भ में भारतीय प्रजातंत्र की दशा’’ विषय  पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक हम जातियों के बंधन को नहीं तोडे़गें तब तक प्रजातंत्र की स्थापना नहीं हो सकती यह समाज उन्नति करना चाहता है तो उसे जातियों के भेद भाव को समाप्त करना होगा। संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द लिखा गया है उसका अर्थ सहीं मायने में समझते हुए हमें एक सद्भावना पूर्ण समाज बनाना होगा। राजनीतिज्ञों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और जो बातें और जो कर्म वे करते है उसे गरिमापूर्ण बनाना होगा तभी वे समाज में एक आदर्श स्थापित कर सकते है और एक आदर्श भारतीय प्रजातंत्र की स्थापना के लिए दिशा दे सकते है।

                समारोह के विषिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे।

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत सरदार बलदेव सिंह कालरा, श्री खुशहाल सिंह बाधवा, श्री सरदार सुरेद्र सिंह अरोरा, श्री उमाशंकर मिश्रा, श्री सुधीर श्रीवास्तव एवं श्रीराम दवे ने किया।

                                संचालन श्रीमती करूणा गर्गे ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 30 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 30 अक्टुबर सोमवार को  ख्यात राजनीतिज्ञ सुश्री मीनाक्षी नटराजन  ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम ही भारतीय समाज का आधार है’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विद्युत्प्रभा बहिन जी महाराज साहब ‘‘नारी अपने गौरव को पहंचाने’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे। विशिष्ट अतिथि प्रषांति धाम के ट्रस्टी श्री के.पी. डोंगरे रहेंगे।

Press Note Day 4

28-Oct-2017,16:54:51,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

कश्मीर की स्थिति के लिए भारतीय राजनीति जिम्मेदार है  - डॉ. क्षमा कौल

उज्जैन। महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रयास किये थे और स्वतंत्रता के पहले तक कष्मीर सुरक्षित भी था। किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय राजनीति में कई ऐसे फैसले हुए जिससे कश्मीर की सुरक्षा खतरे में रही है। वहां अलगाववादियों में इतना अंतर्विरोध नही है जितना अन्तर्विरोध भारतीय राजनीति में है। स्वतंत्रता के पश्चात् कश्मीर में धारा 35 एवं धारा 370 लगाई गई जिसके दुष्परिणाम आज तक देखने को मिल रहे है। आश्चर्यजनक यह है कि भारतीय राजनीति का कोई भी दल इसे अभी तक हटा नही पाया है। वादे तो किये जाते है किन्तु यह स्वार्थ की ओर वोटो को हड़पने की राजनीति का ही परिणाम है, कि वहां ये धाराऐं हट नहीं पाई है। इन्हीं का परीणाम है कि वहां से शादी करके जाने वाली लड़कियों एवं पाक अधिकृत कश्मीर से आये हिन्दुओं को कश्मीर की नागरिकता से वंचित रहना पड़ रहा है। वहां अलगाववादि आजादी की मांग कर रहे है, कुछ अलगाववादि पाकिस्तान के साथ विलय की मांग कर रहे है और कुछ है जो स्वयं के नियमों को पालन करने की मांग कर रहे है। ये वे लोग है जो भारत से घृणा कर रहे है, भारत का विनाश और विखण्डन चाहते है। कश्मीर का अपना स्वयं का एक ध्वज है। यह भी अपने आप में भारतीय राजनीति के फैसले का ही परिणाम है। यह भारतीय संविधान उलट नही तो और क्या है? हमारा पड़ोसी राष्ट्र तो बहुत पहले से कश्मीर में हिंसा पहलाने का कार्य कर रहा है। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की सेना ने कष्मीर में आगजनी, लूटपाट, धर्म परिवर्तन, कई अमानवीय कार्य किये। यह कश्मीर का प्रथम जेहादी हमला था। उक्त विचार ख्यात साहित्यकार डॉ. क्षमा कौल ने ‘‘भारतीय राजनीति और काश्मीर’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के चतुर्थ दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए सिंहस्थ प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री निवाकर नातू ने ‘‘एकात्मवाद में विकास की संभावना’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के आदर्शो का अनुसरण करते हुए हम एकात्मवाद में विकासवाद की प्रबल संभावनाओं को समझ पायेगें। एकात्मवाद का चिंतन संपूर्ण विश्व को प्रभावित कर रहा है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए अवसरों की समानता में ही एकात्मवाद की भावना समाहित है। स्वार्थ की भावना को त्याग कर हमें परहित, लोकहित और समाजहित को सर्वपरी बनाना होगा तभी हम विकास की ओर अग्रसर हो पायेगे।         

                समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। 

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री नारायण मंघवानी, डॉ. पुष्पा चौरसिया, सुश्री शीला व्यासडॉ. नीलम महाडिक, डॉ. तनूजा कदरे, डॉ. रश्मि शर्मा एवं श्रीमती मीना नागर ने किया।

                                संचालन सुश्री दृष्टि चावड़ा ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 28 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 28 अक्टुबर शनिवार को  सेवानिवृत कमिश्नर मुम्बई पुलिस श्री शमशेर खान पठान ‘‘मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह एवं उसका हल’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए महर्षि सांदिपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव प्रो. विरूपक्ष वि. जड्डीपाल ‘‘वैद में विकास की अवधारणा’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 2

25-Oct-2017,19:34:40,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

विचार शक्ति एक वरदान है, इसे अभिशाप नहीं बनने देना चाहिए - डॉ. श्वेता जैन

उज्जैन। मनुष्यों को विचार शक्ति एक वरदान के रूप में मिली है। हमें इस शक्ति का उपयोग सकारात्मक रूप में ही करना चाहिए, तभी सही अर्थां में जीवन निर्माण कर सकते है। यदि विचार नकारात्मक प्रवृति की ओर अग्रसर होते है तो वे अभिशाप बन जाते है। जिस प्रकार श्वास पर नियंत्रण करके स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है वैसे ही विचारों पर नियंत्रण करके सफलता को प्राप्त किया जा सकता है। सफल व्यक्ति कभी विचारों के गुलाम नहीं रहे है। विचारों में नकारात्मकता हमें अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुँचने देती। क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे अवगुण नकारात्मक विचारां को जन्म देते है। हमारे विचार जैसे होंगे वैसा ही हमारा व्यवहार भी होगा। जीवन तो सभी को मिला है, किन्तु विचार करने की शक्ति सिर्फ मनुष्यों को प्राप्त है। विचारों का प्रतिपल आना और विलिन हो जाना एक सतत् प्रक्रिया है। अभ्यास करते हुए हमें अपने विचारों को सकारात्मक दिषा देने में सफलता मिल जायेंगी। उक्त विचार दिल्ली की ख्यात षिक्षाविद् डॉ. श्वेता जैन ने ‘‘ वर्तमान युग की मांग - जीवन निर्माण’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदष .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के द्वितीय दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।           

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए संयुक्त सेल्स टेक्स कमिश्नर श्री गोपाल पोरवाल ने ‘‘जी.एस.टी. की देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जी.एस.टी. ने अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किये है। जी.एस.टी. के पहले विविध प्रकार के टेक्स वस्तुओं पर लगते थे। उत्पादन से विक्रय तक की यात्रा में दो केन्द्रिय एवं पांच राज्यस्तरीय कर देना होते थे किन्तु जी.एस.टी. लागू होने के पश्चात् अब सारे टेक्स एक संपूर्ण टेक्स में समा गये है। जी.एस.टी. लागू होने से उपभोक्ताओं को यह फायदा हुआ है कि वस्तुओं की कीमत कम हुई है। हालांकि यह आज हमें महसूस नहीं हो रहा है किन्तु भविष्य में यह बात हमें महसूस होगी। टेक्स के नियमों का पालन करने में जो शुल्क लगता था वह भी अब कम हुआ है। खास बात यह है कि अब व्यवस्थाऐं ऑनलाईन है। अतः टेक्स की चोरी अब नहीं हो सकती है। यद्यपि व्यापारी वर्क जी.एस.टी. टेक्स देना तो चाहता है किन्तु समस्या यह है कि उसके खातें में टेक्स देने लायक रकम फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हमें जी.एस.टी. के लिए अपने आपको तैयार करना होगा। निकट भविष्य में सरकार को जी.एस.टी. से बहुत लाभ होगा।

                                विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह प्रार्थना की विशेषता यह रही कि एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत सुश्री शीला वैद्य, श्रीमती उर्मिला कुलश्रेष्ठ, सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ, एम.के. भटनागर, डॉ. मनीषा ठाकुर, श्री अविनाष बर्वे, श्री खुशहाल सिंह वाधवा एवं श्री कैलाष नारायण शर्माने किया।

                                संचालन डॉ. सीमा दुबे ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट  पर उपलब्ध है।

                                                        सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 26 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 26 अक्टुबर गुरूवार को वर्ल्ड वि.वि. यू.के., यू.एस.. प्रोफेसर डॉ. सोहन राज तातेड़ ‘‘ सृष्टि संरक्षण की अवधारणा ’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए उज्जैन के कलेक्टर माननीय संकेत भोण्डवे  ‘‘सामाजिक न्याय की अवधारणा’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

 

Press Note Day 1

24-Oct-2017,19:50:43,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सभी से मित्रवत् व्यवहार आज के समाज की आवश्यकता है - आचार्य हर्ष सागर जी म.सा.
समाज में हिंसा व वैमनस्य का दौर है। यदि इस दौर को समाप्त करना है तो अन्तर मन से सभी जीवों में एक दूसरे के प्रति आदर, स्नेह और सद्भाव होना चाहिए। सभी से मित्रवत् व्यवहार करना समाज पहली आवश्यकता है। किसी भी धर्म मेें परस्पर हिंसा की बात नही कहीं गई है बल्कि सभी धर्म एक -दूसरे का आदर करने का संदेश ही देते है। मनुष्य ने धर्म और जातिवाद को महत्व देते हुए हमारी मूल संस्कृति को भुला दिया है। समाज से संकीर्ण विचारधारा के कारण ही हम सद्भाव से दूर होते जा रहे है। विचारधारा जितनी अधिक परिपक्व और विस्तृत होगी, हम भेदभावों का बंधन उतने ही बेहतर रूप से दूर कर पायेगे। वास्तविक मित्रता वह जिसमे हम दूसरे जीव के प्रति चिन्ता का भाव रखे। यदि मैत्री भाव समाज में होगा तो ही सद्भाव की गंगोत्री बहती रहेगी। उक्त विचार आचार्य हर्ष सागर जी महाराज ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के शुभारंभ अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘सद्भाव मितिमैः सव्व भुवेषु (जीवमात्र के प्रति सद्भाव)  विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात संस्कृत विद् डाॅ. मोहन गुप्त ने ‘महाभारत का सामाजिक मर्म’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समकालिक सामाजिक परिस्थितियां मनुष्य को ऐसा काम करने के लिए मजबुर कर देती है। जो वह नहीं करना चाहता। यदि सद्भाव का गुण महाभारत काल में होता तो भयंकर विनाश टल सकता था। लोगों में प्रतिक्षा करने का धैर्य कम होता जा रहा है। फलस्वरूप समाज में अधर्म बड़ रहा है। हमारी नई पीढ़ी को हमारे नेैतिक मूल और संस्कारों को समझना बहुत आवश्यक है। महाभारत की कई घटनाऐं है जो हमें जीवन जीने के नए आयाम देती है। हमारा यह दायित्व है कि हम इन मूल्यों को युवा पीढ़ी तक पहुँचाए।
विषिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में सद्भावना दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा समारोह के आरंभ में सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह प्रार्थना की विशेषता यह रही कि एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री प्रदीप जैन, श्री नवीन भाई आचार्य, श्री दिवाकर नातू, डाॅ. पिलकेन्द्र अरोरा, श्री एच.एल.महेश्वरी, श्री मथुरा प्रसाद शर्मा एवं कवि आनन्द जी ने किया। 
संचालन डाॅ. गिरीश पण्ड्या ने किया तथा आभार डाॅ. रश्मि शर्मा ने माना। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 7

09-Nov-2016,19:36:38,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

मानसिक शांति के बिना विष्वशांति संभव नहीं है - गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज
विष्वषांति के लिये हमें उसके मूल में जाना होगा और यह सोचना होगा कि उसका उद्गम कहाँ से हुआ ? विष्लेषण करने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि व्यक्ति यदि मानसिक रूप से शांत नहीं हैं तो विष्वषांति की बात करना बेमानी है क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही राष्ट्र या विष्व की कड़ी जुड़ती है। ऐसे में व्यक्ति का मन शांत होना विष्वषांति की प्रथम आवष्यकता है। स्वयं के भीतर शांति लाना एक साधना और एक तपस्या है। मानसिक रूप से प्रसन्न रहना हमें सीखना होगा। शांति सिर्फ घोषणाओं को करने से या जुलूस निकालने से नहीं आती है। यह सब तो औपचारिकता भर है। वास्तविक अहिंसा तो हमारे विचारों में या सोच में होना चाहिये। हमारी सोच अहिंसक तभी होगी जब हम संस्कारों को ग्रहण करेंगे और संस्कार हमेषा षिक्षा से मिलते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज की षिक्षा अहिंसा नहीं सीखा रही है। आज की षिक्षा तो सिर्फ स्पर्धा करना सीखाती है और वह भी अस्वस्थ स्पर्धा। स्पर्धाएँ हमेषा हिंसा को जनित करती है। ऐसे में हम संस्कार, सोच और अहिंसा की बात कहाँ से कर सकते है ? जिस दिन समाज में षिक्षक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका और कर्तव्य को समझेगा उस दिन विष्वषांति जरूर कायम होगी। वर्तमान में षिक्षक सिर्फ किताबी ज्ञान को पढ़ाना ही अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं जबकि होना यह चाहिये कि विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ मूल्यपरक षिक्षा प्रदान करें। हमारी संस्कृति सहअस्तित्व की संस्कृति है। इस संस्था में महाविद्यालय की छात्राओं के लिये भी ड्रेस कोड लागू किया गया है। यह स्वागत योग्य पहल है। इस निर्णय में अहिंसा की खुषबू है। हमें वह वातावरण निर्मित करना होगा जिससे युवा पीढ़ी अहिंसा युक्त समाज का निर्माण करें। जो बात मुझे पसंद नहीं है वह मैं दूसरों पर भी लागू नहीं करूँगा। यह सोच ही अहिंसा है। अहिंसा दो प्रकार की होती हैं एक व्यवहारिक अहिंसा और एक परमार्थिक अहिंसा। हमंें यह मंथन जरूर करना चाहिये कि हमने विगत वर्षों में क्या प्राप्त किया है और क्या गंवाया है ? उक्त विचार परम पूज्य गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज, अहमदाबाद ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस के अवसर पर ‘अहिंसक समाज की रचना और विष्व शांति’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीष उच्च न्यायालय श्री वी.डी. ज्ञानी साहब ने ‘लोकमान्य तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में योगदान’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह युग प्रबंधन और प्रदर्षन का युग है। हमें इस युग में लोकमान्य तिलक को याद करना होगा। तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में विषेष योगदान है। तिलक ने अपने सषक्त लेखन से समाज को नई दिषा देने का कार्य किया है। लोकमान्य तिलक के लिये हमेषा से राष्ट्र सर्वोपरि रहा हैं और इसलिये उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोकहित के लिये समर्पित कर दिया था। ऐसे लोकमान्य तिलक का जीवन दर्षन युवा पीढ़ी तक पहुँचना बहुत आवष्यक है। यह हम सबका दायित्व है कि तिलक के विचारों को प्रसारित करने की दिषा में हम महती भूमिका अदा करें।
समारोह के विषिष्ट अतिथि श्री मुकुंद कुलकर्णी ने संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का प्रत्येक क्षण कीमती है। हमें प्रति पल विचारों का मंथन करके समाज हित के कार्य करते रहना चाहिये। वर्तमान में व्यक्ति आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध हो रहा है। यह प्रवृत्ति बदलना होगी। समाज में जितना हम प्राप्त कर रहे है उससे कई गुना हमें समाज को लौटाना होगा।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। 
अतिथि स्वागत डाॅ. अषोक पंडित, श्री रषीदउद्दीन एडवोकेट, श्री शैलेन्द्र पटवा, डाॅ. पारस मारू, श्री राहुल कटारिया, श्री ए.के. साकोरीकर, श्री सुधीर श्रीवास्तव, श्री महेन्द्र सिरोलिया, सुश्री शीला व्यास द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। समापन संध्या पर सद्भावना व्याख्यानमाला को सफल बनाने के लिये प्रयासरत समिति के सक्रिय कार्यकताओं का सम्मान भी किया गया। संचालन सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 6

08-Nov-2016,19:20:21,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

गांधी विचार की उपेक्षा संपूर्ण दुनिया को भारी पड़ सकती है - श्री उमेष श्रीवास्तव
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शांति का जो मार्ग हम सभी को दिया हैं उसका कोई अन्य विकल्प नहीं है। शांति का मार्ग सिर्फ ‘‘शांति’’ ही हो सकता है। गांधी विचारों में वह शक्ति है जो विष्व की प्रत्येक समस्या का निदान कर सकती है। गांधी विचारों की उपेक्षा सम्पूर्ण दुनिया को भारी पड़ सकती है। युवा पीढ़ी के समक्ष हमने गांधी को ठीक ढंग से प्रस्तुत नहीं किया है। यही कारण हैं कि युवा पीढ़ी गांधी को सम्पूर्ण रूप से समझ नहीं पाई है। हम गांधी का चरखा चलाना और सूत काटना तो जानते हैं किंतु उनकी बताई हुई सहिष्णुता, प्रेम और अहिंसा की बातों को भूल गए है। यह ठीक इस प्रकार है कि हमने तंत्र को तो पकड़ लिया किंतु तत्व को भूल गए। श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में स्वयं कोई हथियार नहीं उठाए। आगे चलकर बुद्ध और महावीर ने भी अहिंसा और करूणा का संदेष हमें दिया और इसके बाद महात्मा गांधी का उदय हुआ जिन्होंने भी सम्पूर्ण विष्व को शांति का सन्मार्ग बताया। तकनीकी स्पर्धा ने प्रकृति को समाप्त कर दिया है। इससे तो बेहतर तब था जब मनुष्य गुफा में ही रहता था। उस वक्त वह प्रकृति से खिलवाड़ तो नहीं करता था। वर्तमान में हम युद्ध के बादल प्रतिदिन मंडराते हुए देखते हैं। यदि युद्ध होता हैं तो विकास धरा ही रह जाएगा। जीवन की बहुत छोटी बातें जो हमें ध्यान रखना चाहिये। जैसे षिक्षक यदि मेज को जोर से थपथपाकर या डांट फटकार लगाकर कक्षा में विद्यार्थियों को शांत करता है तो इसमें कोई शंका नहीं कि विद्यार्थियों में यह भाव आ जाएगा कि हिंसा से ही अपनी बात मनवाई जा सकती है। बच्चों को विद्यालय भेजते वक्त यदि माँ यह कहती हैं कि बेटा अपना लंच किसी को मत देना क्योंकि सब अपना लंच लेकर आते है। तो इससे बच्चे के मन में दूसरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की भावना कहाँ से आएगी ? कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह ‘सुमन’ की पंक्तियों ‘‘षिप्रा सा तरल सरल बहता हूँ’’ में बहुत बड़ा दर्षन छुपा है कि यदि जीवन में गति और लय है तो ही बहाव होगा। उन्हीं की पंक्ति ‘‘कालिदास की शेष कथा कहता हूँ’’ में दायित्व का भाव झलकता है। उक्त विचार अहमदाबाद के उमेष श्रीवास्तव जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के षष्ठम दिवस के अवसर पर ‘सामाजिक समरसता में युवाओं की भूमिका’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
विषिष्ट वक्ता के रूप में समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने कहा कि हमारी संस्कृति बहुत समृद्ध है। हमें इसे बिल्कुल भी नहीं खोने देना चाहिये। प्रत्येक संस्कृति की अपनी विषेषता होती हैं और साथ ही कुछ बुराईयाँ भी होती है। हमें सभी संस्कृतियों की अच्छाईयों को अपनाकर आगे बढ़ना चाहिये। यह बहुत ही दुखद हैं कि हम अपनी ही संस्कृति की विषेषता को भूल चले है।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत श्री मोहन नागर, श्री महेष कुमार सिंघल, श्री महेन्द्र शर्मा, श्री मोहसीन खान, श्रीमती अचला जौहरी, श्री शोभित दुबे द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन प्रो. निरंजन कुमार बेलिया ने किया। व्याख्यान की जानकारी  वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 09 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 09 नवम्बर बुधवार को प.पू. गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज  साहब ‘अहिंसक समाज की रचना और विष्व शांति’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीष, उच्च न्यायालय श्री वी.डी. ज्ञानी साहब ‘लोकमान्य तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में योगदान’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 5

07-Nov-2016,19:51:57,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

समाज में विचारों के निष्कर्ष की अपेक्षा विचारों का प्रसार अधिक हो रहा है - श्री बजरंगलाल अग्रवाल
वर्तमान में जो हालात हैं उसके पीछे कारण यह है कि विचारों का प्रसार तो बहुत हो रहा हैं किंतु विचार मंथन करके उससे निकलने वाले निष्कर्ष के प्रति कोई गंभीर नहीं है। जो व्यक्ति किसी संगठन से जुड़ा हैं वह विचारों का प्रचारक ही हो सकता है। विचारक कभी संगठन से नहीं जुड़ता है। यदि कोई वैचारिक क्षमता रखने वाला व्यक्ति समाज में कुछ बदलाव लाने की पहल करता भी है तो संगठन शक्ति उस पर हावी हो कर उसका मार्ग परिवर्तित कर देती है। प्राचीनकाल में ज्ञान को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। आगे चलकर राज्य को सर्वोच्च सम्मान मिलने लगा और वर्तमान में सत्ता और धन के बीच सम्मान प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। विचार शक्ति कमजोर हैं और पूंजी शक्ति हावी हो चुकी है। स्वार्थ बढ़ रहा है और परिवार टूट रहे है। धर्म और विज्ञान के बीच दूरी बढ़ रही है। धर्म रूढ़िवाद की ओर जा रहा है और विज्ञान भौतिकवाद की ओर। पर्यावरण ताप वृद्धि के रोकने के लिये तो कई सम्मेलन होते हैं किंतु मनुष्य के मस्तिष्क में आवेष की जो तापवृद्धि हो रही है उसे रोकने के लिये कुछ नहीं हो रहा है। लोक और तंत्र के बीच दूरी बढ़ रही है। लोक कमजोर होता जा रहा हैं और तंत्र मजबूत होता जा रहा है। लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होना चाहिये किंतु उसे लोक नियुक्त तंत्र बना दिया गया है। धर्म का व्यवसायीकरण हो रहा है। अब तो एन.जी.ओ. भी समाज सेवा का बोर्ड लगाकर व्यवसायी बन चले है। यह तो समाज सेवा के नाम पर व्यापार है। समाज के साथ धर्म, राजनीति का व्यवसायीकरण हो रहा है। गांधी की तस्वीर के सामने ही आतंकवाद या नक्सलवाद के समर्थन के कार्य किये जा रहे है। हमारे राज्यों को ही नहीं पता हैं कि उनका दायित्व क्या है और कर्तव्य क्या है ? होना यह चाहिये कि आतंकवाद या हिंसा जैसी बुराईयों का अंत करने का दायित्व सरकार का होना चाहिये और शराबबंदी के समर्थन में लोगों को स्वयं जागरूक होना चाहिये किंतु हम शराबबंदी के लिये सरकार की ओर देखते है। फलस्वरूप सरकारें लोकहित छोड़कर लोकप्रिय कार्य करने में लगी है। लोगों में मौलिक अधिकार भी सुरक्षित नहीं है। सारी समस्याओं का समाधान इस निष्कर्ष में है कि लोकतंत्र को सहभागी लोकतंत्र का स्वरूप देना चाहिये। राज्य को न्यूनतम हिंसा का मार्ग छोड़कर समुचित हिंसा का मार्ग अपनाना चाहिये। हमारे यहाँ प्रवृत्तियों का प्री-टेस्ट करने की कोई व्यवस्था नहीं है जो होना चाहिये। संगठन नहीं बल्कि संस्था बनने पर अधिक ध्यान देना चाहिये। उक्त विचार भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के पंचम दिवस के अवसर पर ख्यात सर्वोदयी श्री बजरंगलाल अग्रवाल जी ने ‘विष्व की प्रमुख समस्याएँ और प्रभावी समाधान’ विषय पर अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किये।
समारोह के मुख्य वक्ता कार्यकारी संपादक सर्वोदय जगत श्री अषोक मोती जी ने ‘सुरक्षा आंदोलन, भारत विभाजन, आजादी की लड़ाई’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने समाज में वक्ता की भूमिका कम और कर्ता की भूमिका अधिक निभाई है। इतिहास साक्षी हैं कि सुरक्षा आंदोलनों ने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। मैं स्वयं जयप्रकाष नारायण के आंदोलन से बहुत प्रभावित हूँ और मैं उनके आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उनके साथ ही था। गांधी और जयप्रकाष नारायण के विचारों को युवाओं तक पहुँचना ही चाहिये।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत श्री दिनेष पण्ड्या, डाॅ. प्रेमनारायण पांचाल, श्री विष्णु मालवीय, श्री कुलदीप कुषवाह, श्रीमती उषा चौहान, डाॅ. उर्मी शर्मा, श्री लक्ष्मीप्रसाद गौतम द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन प्रो. ज्योत्सना शाक्य ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 08 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 08 नवम्बर मंगलवार को अहमदाबाद के श्री उमेष श्रीवास्तव जी ‘सामाजिक समरसता में युवाओं की भूमिका’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। अध्यक्षता उज्जैन कलेक्टर श्रीमान संकेत कुमार भोण्डवे जी करेंगे।

Press Note Day 4

06-Nov-2016,19:41:40,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

अंधविष्वास इस देष का सबसे बड़ा दुष्मन है - श्री आनंदमोहन माथुर
ईष्वर के प्रति हमें आस्था रखना चाहिये किंतु जीवन को तारने के लिये और समाज को तारने के लिये प्रयास तो हमें ही करना चाहिये। जो व्यक्ति स्वयं की हिम्मत पर विष्वास करता है वह स्वयं के साथ अन्य को भी तार सकता है। हम भले ही विकसित समाज की बात करें किंतु सच तो यह है कि आज भी अंधविष्वास इस देष का सबसे बड़ा दुष्मन है। अंधविष्वास से ही समाज का पतन होता है। हमारे अपने विचार स्वतंत्र होना चाहिये तभी हम सही दिषा में चिंतन कर सकते है और देष को प्रगति के पथ पर ले जा सकते है। स्वतंत्र विचारों के अभाव में ही नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। दोहरे चरित्र की मानसिकता भी समाज में नैतिक मूल्यों का उत्थान नहीं होने देती। सामाजिक ढाँचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना ही इंकलाब है। आज भी जातिगत भेदभाव समाज में हावी है। यह समाज की कौन सी प्रगति है ? यदि समाज में बदलाव नहीं आया तो हम सैकड़ों वर्ष पीछे हो जाएंगे। महिलाओं को चाहिये कि वे पुरूषों से बराबरी का हम स्वयं मांगे। भले हम आज बदलाव की बात करते है किंतु सच तो यह है कि आज भी घरों के बर्तनों में पुरूषों का ही नाम लिखा मिलता है। हम स्मार्ट सिटी की बात भले करें किंतु क्या बिना मुआवजों के मकानों पर बुल्डोजर चलाना ठीक है ? आज भी ऐसे कई उदाहरण है जहाँ यह साफ तौर पर स्पष्ट होता है कि समाज में समानता कायम नहीं है। जिस देष में समानता नहीं होगी वहाँ नैतिक मूल्य कभी समृद्ध नहीं हो पाएंगे। उक्त विचार वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व महाधिवक्ता श्री आनंदमोहन माथुर ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के चतुर्थ दिवस के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘मानवीय मूल्यों का पतन’ विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात षिक्षाविद् प्रो. पुष्पेन्द्र दुबे जी ने ‘किसानों की खुषहाली और देष की समृद्धि’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हम व्रत तो कई अवसरों पर करते है किंतु हमें व्रत यह भी करना चाहिये कि हमारे देष में अन्न का उत्पादन भरपूर मात्रा में हो। हमारी समृद्ध परम्परा में गौवंष को परिवार का सदस्य माना जाता है। बिना गाय की रक्षा के खेती की कल्पना नहीं की जा सकती है। आष्चर्य होता हैं यह जानकर कि जिन राज्यों में मांसाहार पर बंदिष लगाई गई हैं वहा मांसाहार का ही उत्पादन दोगुना पाया जाता है। वही किसान भविष्य में जीतेगा जिसके पास जमीन होगी। माक्र्स में बहुत पहले ही यह कह दिया था कि हमें सामूहिक खेती की ओर अग्रसर होना चाहिये। आजादी के बाद शहर तो आजाद हो गए हैं किंतु गांवों को आजाद होना अभी बाकी है। 
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत स्टेट बार कौंसिल के पूर्व सदस्य श्री बालकृष्ण उपाध्याय एडवोकेट, बार एसोसिएषन के अध्यक्ष श्री योगेष व्यास एडवोकेट, लाॅ एसोसिएषन के श्री सुरेष जैन एडवोकेट, श्री मथुरा प्रसाद शर्मा एडवोकेट, वरिष्ठ चिकित्सक डाॅ. जी. के. नागर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर, श्री रणवीरसिंह कुषवाह एडवोकेट, श्री प्रमोद जैन एडवोकेट द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन डाॅ. सीमा दुबे ने किया तथा आभार राष्ट्रभारती षिक्षा महाविद्यालय की प्राचार्या डाॅ. रष्मि शर्मा ने माना। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 07 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 07 नवम्बर सोमवार को सर्वोदय जगत, वाराणसी के कार्यकारी सपांदक श्री अषोक मोती जी ‘सुरक्षा आंदोलन भारत विभाजन आजादी की लड़ाई’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए श्री बजरंगलाल अग्रवाल जी ‘विष्व की प्रमुख समस्याएँ और प्रभावी समाधान’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 3

05-Nov-2016,19:31:37,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

ऐसा विकास जो बैचेनी उत्पन्न करें वह सम्पूर्ण विकास नहीं है। - सुश्री मणिमाला जी
हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि हम विकास कर रहे है। लेकिन क्या यह वास्तविक विकास है ? हमें सही मायनों में विकास के मापदण्ड तय करने होंगे। संपूर्ण विकास कायम करने के लिये यह बहुत आवष्यक है। जो विकास बैचेनी उत्पन्न करें वह सम्पूर्ण विकास नहीं है। आजादी के बाद जो विकास हुआ है वह सही दिषा में नहीं हुआ है। समाज में क्रय शक्ति हावी हो चुकी है। यही कारण है कि बाजारवाद में हर वस्तु बिक रही है। यहाँ तक की इंसान भी बिक रहा है। नगरों या महानगरों में सुबह श्रमिकों की खरीददारी होती है। क्या हम इस विकास कहेंगे ? महात्मा गांधी ने कहा था कि शारीरिक से किये गये श्रम का अत्यधिक महत्व होता है। वेतन का निर्धारण भी शारीरिक श्रम के लिये होना चाहिये। मानसिक श्रम भी महत्वपूर्ण है किंतु यह सवैतनिक न होकर समाज हित में किया जाने वाला कार्य होना चाहिये। किसी को उजाड़कर हम विकास नहीं कर सकते है और इसके लिये आवष्यक हैं कि हमें अपनी आवष्यकताओं को सीमित करना होगा। जो क्रिकेट मैच सूरज की रोषनी में खेला जा सकता हैं उसे फ्लड लाईट में खेलने की क्या आवष्यकता है?  कई मेगावाट बिजली उत्पन्न करने के लिये हमें जमीन, श्रम और रूपयों की कितनी आवष्यकता होती है यह हमें समझना चाहिये। धरती सबकी आवष्यकताएँ पूरी कर सकती हैं किंतु धरती किसी का लालच पूर्ण नहीं कर सकती। वर्तमान में यही हो रहा है कि निजी स्वार्थ और भौतिकवाद के चलते हम लालच युक्त वृत्ति के हो गए है। वास्तव में प्रत्येक को रहने के लिये एक घर मिले यह विकास की अवधारणा का अंग है किंतु हो यह रहा है कि एक-एक व्यक्ति कई-कई मकानों को खरीदने की दौड़ में लगा है। हम विज्ञान की दिषा में कितनी प्रगति क्यों न कर ले किंतु चावल या गेहूँ को लेबोरेट्री में नहीं बना सकते है। इसके लिये हमें जमीन में उत्पादन करना होगा और इस आवष्यक कार्य के लिये जमीन को बचाना भी बहुत आवष्यक है किंतु जमीन समाप्त होती जा रही है। सम्पूर्ण विकास के लिये षिक्षा का भी महत्वपूर्ण योगदान है। वास्तविक षिक्षा वह हैं जो मन, बुद्धि और चरित्र का विकास करें। षिक्षा और श्रम की दूरियाँ कम होनी चाहिये।  उक्त विचार दिल्ली की ख्यात सर्वोदयी सुश्री मणिमाला ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के तृतीय दिवस के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘विकास की अवधारणा और महात्मा गांधी’ विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ सर्वोदयी डाॅ. सुगन वरण्ड जी ने ‘‘अन्त्योदय की अवधारणा’’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वास्तव में समाज के अंतिम व्यक्ति के उदय में ही अन्त्योदय की अवधारणा निहित है। यह कैसे संभव होगा यह चिंतन का विषय है। आत्मोदय से अन्त्योदय तक पहुँचने की श्रृंखला हमें कायम करना होगी। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा का उदय होगा तभी उसमें जागरूकता आएगी तभी वह अपने अधिकारों के लिये लड़ना सीखेगा और तभी अन्त्योदय तक हम पहुँच पाएंगे। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि हमारी कमाई का पहला रूपया भोजन में, दूसरा वस्त्र और तीसरा आवास के लिये होना चाहिये किंतु उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि कमाई का चैथा रूपया ‘‘औजार’’ के लिये होना चाहिये। यहाँ औजार से आषय अपने ज्ञान को अपडेट करना है। चाहे वह षिक्षक हो, वकील हो, डाॅक्टर हो। वह अपने व्यवसाय में प्रतिदिन हो रहे परिवर्तनों के प्रति जागरूक रहे यह बहुत आवष्यक है।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत डाॅ. एच. एल. माहेष्वरी, डाॅ. कमलकांत मेहता, श्री एच.के. शुक्ला, डाॅ. शषिकला रावल, श्रीमती शांति त्रिवेदी द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन भारतीय महाविद्यालय की प्राचार्या डाॅ. नीलम महाडिक ने किया तथा आभार लिटिल जेम्स प्ले स्कूल की डायरेक्टर सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ ने माना। व्याख्यान की जानकारी  वेबसाईट पर उपलब्ध है।
सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 06 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 06 नवम्बर रविवार को पूर्व महाविधवक्ता मध्यप्रेदष श्री आनंदमोहन माथुर ‘‘मानवीय मूल्यों का पतन’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 2

04-Nov-2016,19:44:36,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सफल जीवन यात्रा की तैयारी युवाओं को पूर्व से करना होगी - श्री युगराज जैन
जब हम लम्बी रेल यात्रा पर निकलते हैं तो उसके लिये व्यापक तैयारियाँ पहले से ही कर लेते है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि जिस जीवन यात्रा पर हम निकले हैं तो उसके लिये भी संपूर्ण तैयारियाँ समय रहते कर ली जाएँ? समय प्रति पल परिवर्तित हो रहा है। समय का सम्मान जिसने कर लिया वो जीवन में नई ऊचाईयों को प्राप्त करता है। जीवन का महत्वपूर्ण समय हम फिल्मों में या ब्यूटी पार्लर मंे जाकर व्यर्थ क्यों करें ? समय का सही सदुपयोग हमारे भाग्य को संवार देगा। हमें अपने माता-पिता सहित अन्य रिष्तों का सम्मान करते सीखना होगा। जीवन में से किंतु, परंतु जैसे शब्द निकालने होंगे और दृढ़ संकल्पित होकर आगे बढ़ना होगा। सकारात्मक सोच जीवन में हमेषा सफलताएँ देती है। हमें अपने आत्मबल और आत्मविष्वास को बहुत ऊँचा रखना होगा। जीवन में किसी भी कदम को उठाने से पहले सौ बार सोचना ही चाहिये। महापुरूष कभी जन्म नहीं लेते हैं बल्कि वे तो कर्म से महापुरूष बनते है। राहों में गुमराह करने वाले तो बहुत मिलेंगे किंतु यह युवाओं की समझ और इच्छाषक्ति होनी चाहिये कि वे गुमराह होने से बचे। पैसों से अमीर क्यों न बन जाए किंतु संस्कारों से इतना कीमती बन जाना की कोई अमीर भी तुम्हें खरीद न सके। आज युवा शरीर को सजाने में अधिक वक्त देते है जो सिर्फ लोगों की नजर में होता है जबकि आत्मा को सजाने पर ध्यान नहीं दिया जाता जो परमात्मा की नजर में होता है। 21वीं सदी है और इस सदी में प्रभाव यह है कि पहले अभाव में भी लोग खुषियाँ ढूंढ लेते थे और अब खुषियों का अभाव आ चुका है। उक्त विचार युगप्रवाह के संपादक श्री युगराज जैन जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के द्वितीय दिवस के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘युवाओं, मुझे तुमसे कुछ कहना है’ विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात साहित्यकार श्री रामयतनजी यादव ने ‘‘षिक्षा में गांधी जी का योगदान’’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गांधी का व्यक्तित्व आदर्षवादी रहा है। आजादी के बाद हमारी षिक्षा में गांधी का दर्षन स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि हम गांधी को भलीभांति आत्मसात नहीं कर पाए है। महात्मा गांधी को मूर्तियों से बाहर निकालकर विचारों के रूप में अपनाने की आवष्यकता है। गांधी ने षिक्षा का वैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्ष हमें दिया है। वे षिक्षा के माध्यम से ही राष्ट्र को ताकत देना चाहते थे। गांधी षिक्षा के माध्यम से ही भारत को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। गांधी ने जिस बुनियादी षिक्षा की बात कही वह संस्कारों से जुड़ी थी।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत श्री नारायण मंघवानी, श्री दामोदर गुप्ता, श्री मथुरा प्रसाद शर्मा, श्री एस. एन. कुलकर्णी, श्री के. सी. श्रीवास्तव, पूर्व महापौर श्री मदनलाल ललावत, श्री महेष ज्ञानी, श्री हरिहर शर्मा द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन श्रीमती करूणा गर्गे ने किया तथा आभार भारतीय ज्ञानपीठ विद्यालय की निदेषक डाॅ. तनुजा कदरे ने माना। 
सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 05 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 05 नवम्बर शनिवार को दिल्ली की सुश्री मणिमाला जी ‘‘विकास की अवधारणा और महात्मा गांधी’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगी। समारोह की अध्यक्षता करते हुए मुंबई के डाॅ. सुगन वरण्ड जी ‘‘अन्त्योदय की अवधारणा’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 1

03-Nov-2016,19:33:49,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

भाषा की समृद्धि से ही सद्भावना कायम होगी - डाॅ. जवाहर कर्नावट
हिंदी भारतीय भाषाएँ सद्भावना कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन भाषाओं की समृद्धि से ही देष में सद्भावना कायम होगी। कई साहित्यकारों ने सद्भाव को प्रसारित करने के लिये हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रचनाएँ लिखी है। हमें अपनी भारतीय भाषाओं का सम्मान करना बहुत आवष्यक है। ऐसा न करने की स्थिति में विचार और भावना लगातार कमजोर होती जा रही हैं। सद्भाव कायम करने के लिये यह बहुत आवष्यक है कि नई पीढ़ी को हम भारतीय भाषाओं से जोड़े। अब तो हिंदी में रोमन का प्रयोग भी होने लगा है। यह अभिव्यक्ति का माध्यम कदापि नहीं है। भाषा के साथ-साथ लिपि का प्रयोग होना अत्यंत आवष्यक है। भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने के लिये निरंतर प्रयास और प्रयोग बहुत आवष्यक है। आर्थिक प्रगति में भी भाषा का विषेष योगदान होता है। चीन सबसे बड़ा उदाहरण है जो स्वयं अपनी मातृभाषा को महत्व देता है। भाषा के विकास में अनुवाद की भी महती भूमिका है। मराठी साहित्य में व्यक्त सार्थक विचारों को यदि हिंदी भाषी समझना चाहे तो एक बेहतर अनुवादक यह कार्य बहुत कुषलता से करेगा। एक-दूसरे की संस्कृति को जानने की दिषा में भी भाषा महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभाती है। उत्तरी भारत के राज्यों की भाषाओं में भी कई प्रेरक विचार हैं जो देष में सद्भाव कायम करने की दिषा में महत्वपूर्ण है। हमें इन राज्यों की भाषाओं में रची गई रचनाओं को भी समझते आना चाहिये। मातृभाषा के लिये भी भारतीय भाषाओं को सीखने का प्रयास करते रहना चाहिये। किसी भी देष की अस्मिता उसकी अपनी भाषा की ही पहचान है। भाषाओं का प्रयोग कभी भी विध्वंस के लिये नहीं होना चाहिये। उक्त विचार प्रसिद्ध साहित्यकार डाॅ. जवाहर कर्नावट जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के शुभारंभ अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘सामाजिक सद्भाव और भारतीय भाषाएँ’ विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने सामाजिक न्याय की अवधारणा पर प्रकाष डालते हुए कहा कि हमें यह सोचना चाहिये के समाज के अंतिम व्यक्ति को भी न्याय कैसे मिले ? उपेक्षित वर्ग को न्याय प्रदान करना भी सामाजिक सद्भावना के लिये बहुत आवष्यक है। समारोह का आरंभ विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि-गण द्वारा सद्भावना द्वीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर, वरिष्ठ व्यंग्यकार डाॅ. पिलकेन्द्र अरोरा, गुजराती समाज के पूर्व अध्यक्ष श्री नवीन भाई आचार्य वरिष्ठ साहित्यकार श्री राम दवे, भारतीय ज्ञानपीठ महानंदानगर की प्राचार्य श्रीमती सुनिता खोलकुटे, भारतीय ज्ञानपीठ महानंदानगर माध्यमिक विद्यालय की कु. पद्मा शर्मा द्वारा किया गया। विद्यालयीन छात्राओं द्वारा समारोह के आरंभ में सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेषा की तरह प्रार्थना की विषेषता यह रही कि एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन डाॅ. गिरीश पण्ड्या ने किया तथा आभार वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. पुष्पा चैरसिया ने माना। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।
सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 04 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 04 नवम्बर शुक्रवार को युगप्रवाह के संपादक श्रीमान युगराज जैन, (मंुबई) ‘‘युवाओं मुझे तुमसे कुछ कहना है’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए श्री रामयतन जी (बिहार) ‘‘षिक्षा में गांधी जी का योगदान’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 7

20-Nov-2015,20:49:06,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

संविधान में बैठे लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझना होगी - चैधरी मुनव्वर सलीम
वर्तमान परिदृष्य में स्थिति यह है कि समस्याओं से निपटने के लिये बहस तो बहुत हो रही है किंतु बिना विषयों के मुद्दों पर ही बहस हो रही है। देष की जो बुनियादी समस्याएँ वे तो यथावत है। संविधान में बैठे लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझना होगी। हम उनके भाषा प्रयोग को सुने तो कई बार हमें ही शर्मिन्दा होना पड़ता है। उन्हें अपने गरिमामयी नेतृत्व से एक नया समाज का निर्माण करना होगा। यदि वे लोग ही गरिमा खो देंगे तो देष कैसे बचेगा ? यह वह देष है जहाँ चित्तौड़ की रानी अपनी रक्षा के लिये हुमायूँ को राखी का धागा भेजती है और वह अपनी बहन की रक्षा के लिये दौड़ा चला आता है। मज़हबी आधारों पर बनने वाले मुल्क अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकते। हमारा देष यदि विकास के रास्ते पर चल रहा हैं तो यह सिर्फ सद्भावना के पथ पर चलने के कारण ही संभव है। कोषिषें तो बहुत हुई हमें अलग करने की, हमें मज़हबों के नाम पर बांटने की। किंतु हमने उनके इरादों को कामयाब नहीं होने दिया। पाकिस्तान जब अलग हुआ तब वहाँ जाने वाले लोगों ने यहाँ बसने वाले मुस्लिमों को जब देषद्रोही करार दिया तब भी भारत में बसने वाले मुस्लिम ऐसी बात से विचलित नहीं हुए। आज भी हमें मज़हब के नाम पर बांटने की कोषिषें हो रही है किंतु हमें ऐसा करने वाले के नापाक इरादों को समझना होगा। ऐसी बातों से सद्भावना आहत होती है। हमें सद्भावना को जागृत रखना होगा और हिंदुस्तान को प्रगति के पथ पर ले जाना होगा। उक्त विचार संसद सदस्य राज्यसभा सदस्य चैधरी मुनव्वर सलीम साहब ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति त्रयोदषी अ.भा. व्याख्यानमाला के समापन दिवस पर ‘‘भारत को समृद्ध बनाने में सद्भावी विचारों की सार्थकता’’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री चैधरी साहब ने कहा कि हमारे देष में विदेषी शैक्षणिक संस्थाओं को लाए जाने की बात की जा रही है। यह उचित नहीं है। नीति आयोेग के आंकड़ें यह कहते हैं कि आज भी देष में 43 करोड़ लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन सिर्फ 32 रूपये ही कमा पाते है। हमें इनकी समस्याओं को ध्यान में रखकर देष को आगे बढ़ाना होगा।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व महाधिवक्ता म.प्र. श्री आनंदमोहन माथुर साहब ने ‘‘देष की वर्तमान अवस्था में सद्भावना का महत्व’’ विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समाज दोहरी मानसिकता का षिकार हो रहा है। हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। हम दिखावे पर अधिक विष्वास करने लगे है। हमें इस ढोंग को समाप्त करना होगा। कही ऐसा न हो कि इस दिखावट के फेर में हमारा देष का विकास अवरूद्ध हो जाए। हमें षिक्षा के स्तर को भी ऊपर उठाना होगा तभी हम युवाओं में सच्ची सद्भावना जागृत कर सकते है। समाज में यूँ तो कई विकृतियाँ हैं किंतु सद्भावना का मूलमंत्र समाज को निष्चित रूप से उत्थान की ओर ले जाएगा। 
समारोह का आरंभ विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत डाॅ. संदीप चैरसिया, पं. विजय त्रिवेदी, श्री निरंजन बेलिया ने किया। इस अवसर पर विषेष रूप से श्री रूपकिषोर शास्त्री, श्री षिव चैरसिया उपस्थित थे।
अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन डाॅ. मुक्ता दुबे ने किया तथा आभार संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने माना।

Press Note Day 6

19-Nov-2015,20:42:07,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

युवाओं को षिक्षित करके ही हम विष्व गुरू बन सकते हैं - श्री अमीन पठान
विष्व गुरू बनने की सामथ्र्य सिर्फ और सिर्फ हमारे भारत देष में है। आवष्यकता इस बात की हैं कि हमें सद्भावना के महामंत्र को जनमानस में समाहित करना होगा। सभी को एक साथ आगे बढ़ना होगा और षिक्षा का प्रसार भलीभांति करना होगा। वर्तमान में आंकड़ों की यदि बात की जाय तो प्रति सप्ताह हमारा एक नौजवान आत्महत्या कर रहा है। आखिर ऐसा क्या है कि हम युवाओं को जीवन का महान महत्व नहीं समझा पा रहे है। हमें युवाओं को षिक्षित करना होगा। उन्हें प्रोत्साहित करना होगा और जीवन जीने का उद्देष्य समझाना होगा, तभी हमारा देष विष्व गुरू बन पाएगा। युवाओं को खेलों के प्रति भी रूचि जागृत करना होगी। उक्त विचार राजस्थान क्रिकेट बोर्ड के कार्यवाहक अध्यक्ष श्री अमीन पठान साहब ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति त्रयोदषी अ.भा. व्याख्यानमाला के षष्ठम दिवस पर ‘‘सद्भावना देष की सबसे बड़ी आवष्यकता’’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री अमीन पठान ने कहा कि आज के युवा नषे की बुरी लत की जकड़ में है। हमें उन्हें इससे बाहर लाना होगा। यदि हम अपने बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ लेकर आगे बढ़े तो निष्चित रूप से युुवा प्रेरणा लेंगे।
सद्भावना व्याख्यानमाला के ही इस मंच पर विष्वप्रसिद्ध शर्मा बन्धु के सुपुत्र पं. अवधेन्दु शर्मा ने अपनी संगीतमयी प्रस्तुतियों से समा बांध दिया। यह पहली बार था जब संगीत और स्वर के माध्यम से सद्भावना को प्रसारित किया गया। पं. अवधेन्दु शर्मा ने डाॅ. सुमन जी की प्रसिद्ध कविता ‘‘चलना हमारा काम है’’ को संगीत के साथ जैसे ही गाना आरंभ किया वैसे ही समूचा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। फिर तो डाॅ. सुमन जी की ही अन्य रचनाओं के साथ पं. अवधेन्दु शर्मा ने ‘‘वैष्णव भजन’’ और ‘‘षंभु अविनाषी’’ जैसे रचनाओं को सुनकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। संगीतमयी प्रस्तुतियों का समापन प्रसिद्ध भजन ‘‘जैसे सूरज की गर्मी से’’ के साथ हुआ जिसने शर्मा बंधु को देषभर में ख्याति दिलवाई। साजिन्दों के साथ पं. अवधेन्दु शर्मा जी की प्रस्तुतियाँ ‘‘सद्भावना के स्वर’’’ के नाम से थी जिन्हें उपस्थितजनों की भरपूर प्रषंसा प्राप्त हुई।
समारोह का आरंभ विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत श्री राजेष शर्मा, श्री मुजफ्फर हुसैन, श्री दिनेष पण्ड्या, डाॅ. ममता शर्मा, श्री शकील कुरैषी द्वारा किया गया। स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। इस अवसर पर विषेष रूप से श्रीमान संजय श्रीवास्तव जी, श्री सोहेब कुरैषी, श्री सरफराज कुरैषी, श्री सुरेन्द्र भटनागर एवं श्रीमती गार्गी शर्मा उपस्थित थे।
अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन भारतीय महाविद्यालय की प्राचार्या डाॅ. नीलम महाडिक ने किया तथा आभार भारतीय ज्ञानपीठ विद्यालय के प्राचार्य श्री सुनीलसिंह सेंगर ने माना। व्याख्यान की जानकारी  वेबसाईट पर उपलब्ध है।
सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 20 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 20 नवम्बर शुक्रवार को नई दिल्ली के राज्यसभा सदस्य श्रीमान चैधरी मुन्नवर सलीम साहब ‘‘भारत को समृद्ध बनाने में सद्भावी विचारों की सार्थकता’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तु करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व महाधिवक्ता म.प्र., इंदौर श्री आनंदमोहन माथुर ‘‘देष की वर्तमान अवस्था में सद्भावना का महत्व’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 5

18-Nov-2015,20:28:06,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सद्भावना के कारण ही हिन्दुस्तान का अस्तित्व कायम है - श्री श्यामकृष्ण पाण्डेय
हमारे अपने भारत देष को विखण्डित करने की कोषिषें तो बहुत हुई किंतु यह हमारी संस्कृति की महानता है कि विभिन्न सभ्यताओं, जातियों और सम्प्रदायों के लोग मिलजुल कर रहते है। इनकी एकता ही हमारे राष्ट्र की शक्ति हैं जो इसके अस्तित्व को कायम रखे हुए है। इतिहास गवाह हैं कि आपसी झगड़ों में सोवियत संघ टूटा, पष्मिच एषिया भी बर्बाद हुआ किंतु हमारा देष प्रगति के पथ पर कायम है। इतिहास यह भी कहता हैं कि हमें गुलामी की जंजीरों ने तभी जकड़ा जब हमारी केन्द्रीय सत्ता कमजोर हुई। भारत में सर्वधर्म समभाव पूर्वकाल से चला आ रहा है। अकबर के राज्य में भी सूबेदारों को अपने कार्यों के लिये पूरी स्वतंत्रता थी। मध्य युग के संघर्ष भी साम्प्रदायिक संघर्ष नहीं थे बल्कि सत्ता के लिये किये गये संघर्ष थे। 156 मंदिरों की सूची है, जिनके रखरखाव की जिम्मेदारी टीपू सुल्तान स्वयं के पास थी। इतिहास यह भी कहता हैं कि श्रृंगेरी के शंकराचार्य और टीपू सुल्तान में एक-दूसरे के प्रति लगाव था और परस्पर सम्मान था। 1857 का संघर्ष हथियारों का संघर्ष था। उक्त विचार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के कार्यसचिव श्री श्यामकृष्ण पाण्डेय ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति त्रयोदषी अ.भा. व्याख्यानमाला के पंचम दिवस पर ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सद्भावना’’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री श्यामकृष्णजी पाण्डेय ने कहा कि हमारे संविधान की प्रमुख शर्तों में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समानता सम्मिलित है। 
समारोह की अध्यक्षता करते हुए विक्रम विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शीलसंधु पाण्डेय ने ‘‘महात्मा गांधी का जीवन दर्षन’’ विषय पर अपने उद्बोधन में कहा कि यदि हमें समाज को जोड़ना है और क्रांतिकारी कार्यों के लिये जागरूकता लाना है तो समाज के अनुरूप हमें ढ़लना होगा। गांधीजी की वेषभूषा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जरा विचार कीजिये यदि अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी अपने उसी सूट-बूट वाले अंदाज में रहते तो क्या वे भारत के जनमानस से जुड़ सकते थे ? उन्होंने लाठी और धोती के सहारे लोगों को अपना बनाया। गांधी ने उपवास को भी एक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। इस शक्ति का महत्व हमें समझना चाहिये एवं इसे अपनाना चाहिये। गांधी ने हमें बताया कि जहाँ अहिंसा है वहीं आत्मिक शांति भी होगी। अहिंसा के इस महामंत्र से ही गांधी ने देष को आजादी दिलवाई और उनका यह महामंत्र आज भी प्रासंगिक है। इस अवसर पर श्रीमती मधुरिमा पाण्डेय, अम्बेडकर पीठ के आचार्य डाॅ. शैलेन्द्र पाराषर, विद्यर्थी कल्याण संकाय अध्यक्ष विक्रम विष्वविद्यालय डाॅ. राकेष ढण्ड विषेष रूप से उपस्थित थे।
समारोह का आरंभ विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत डाॅ. पुष्पा चैरसिया, श्री शोभित दुबे, श्री मोहसिन खान, श्री कुलदीप कुषवाह, सुश्री हीना मंसूरी, श्रीमती सुधा शर्मा द्वारा किया गया। स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। 
अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन डाॅ. तनुजा कदरे ने किया तथा आभार प्रो. पूजा साहू ने माना। 
सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 19 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 19 नवम्बर गुरूवार को विष्व प्रसिद्ध शर्मा बंधु के सुपुत्र पं. अवधेन्दु शर्मा द्वारा ‘‘सद्भावना स्वर’’ के अंतर्गत डाॅ. षिवमंगलसिंह ‘सुमन’ द्वारा रचित कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति सहित अन्य संगीत रचनाएँ प्रस्तुत होगी। पं. अवधेन्दु शर्मा मीरा, तुलसी, कबीर के पदों को संगीतमय रूप से प्रस्तुत करते वक्त आधुनिक शैली का प्रयोग करते हैं जो उनकी विषेषता है। आपके द्वारा संस्कार चैनल पर भजनों का प्रसारण नियमित होता हैं एवं कई एलबम आपके द्वारा प्रसारित है। समारोह की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष श्री अमीन पठान साहब ‘‘सद्भावना देष की सबसे बड़ी आवष्यकता’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

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