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10-Nov-2018,02:46:23,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

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संस्कृति की संवाहक मां है - गच्छादिपति आ.देव श्रीमद् विजय नि.सू.म.सा.

03-Oct-2018,12:09:04,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

संस्कृति की संवाहक मां है - गच्छादिपति आ.देव श्रीमद् विजय नि.सू.म.सा. 
उज्जैन।   भारतीय संस्कृति हमारे जीवन का आधार है और इस संस्कृति की सच्ची संवाहक एक मां होती हैद्य मां अपने बच्चों को संस्कार देते हुए उन्हें रामए महावीर या बुद्ध बना सकती हैंद्य महापुरुष जन्म से पैदा नहीं होते हैं बल्कि उन्हें दिए गए संस्कार उन्हें महापुरुष बनाते हैंद्य जिस समाज में महिला शक्ति का सम्मान किया है वह समाज हमेशा आगे बढ़ा है द्य वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति हम पर हावी हो गई हैद्य मोबाइल के दुष्प्रभाव लगातार बढ़ रहे हैंद्य यही कारण है कि समाज में अनैतिक घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैद्य नारी का अपमान प्रतिदिन हो रहा हैद्य युवा पीढ़ी में भारतीय संस्कारों और संस्कृति का समावेश करने के बाद ही महिलाएं सुरक्षित रह सकती है। उक्त विचार गच्छादिपति आचार्य देव श्रीमद् विजय नित्यसेन सूरिश्वर महाराज साहब ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस ‘समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। गच्छादिपति आचार्य देव श्रीमद् विजय नित्यसेन सू.म.सा. ने कहा कि भारतीय इतिहास साक्षी है कि सामाजिक महिलाओं की भुमिका विषेश रूप से महत्वपूर्ण है। हमें अपने शिक्षा के साथ संस्कार प्रदान करते हुए नारी का वह सम्मान फिर से स्थापित करना होगा। एक मां ही अपने बच्चों को यह संस्कार दे सकती है कि वह जीवन में इतना सामर्थ्यवान बने कि अपने परिवार को जीवन्त रख सके। हमारा जीवन महत्वपूर्ण है यह निर्माल्य नहीं है। वर्तमान में यदि महिलाऐं फैशन की ओर तथा पुरूष सभी व्यसन की ओर चले जाए तो यह समाज के लिए   घातक है। 
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में छत्तीसगढ़ से पधारे ज्ञानतत्व के संपादक श्री बजरंग लाल अग्रवाल (मुनि) ने ‘ वर्तमान सामाजिक समस्याऐं और अहिंसक तरीके से समाधान’ विषय पर व्याख्यान में कहा कि गांधी के इस देश में अहिंसा लुप्त होती जा रही है। जितनी तेजी से भौतिक प्रगति हो रही है उतनी ही तेजी से समाज पतन की ओर भी जा रहा है। शिक्षा का विस्तार तो हो रहा है किन्तु ज्ञान का विस्तार नहीं हो पा रहा है। परिवार व्यवस्थाऐं एवं समाज व्यवस्थाऐं  टूट रही है। इन सभी का समाधान हमें ढूंढना होगा। हमें सम्पूर्ण दुनिया का एक संविधान बनाना होगा। एक ऐसा संविधान जिसमें विश्व के प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका होना चाहिए। हमें सर्वोदय की ओर चलना होगा। हमें वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा की ओर लौटना होगा। गांधी का उद्देश्य स्वतंत्र समाज और स्वतंत्र समाज था। श्रद्धा और तर्क के समन्वय से हमारी समझदारी का विकास होता है। 
इस अवसर पर अमरावती मंडल एवं मातृभूमि के संपादक श्री अनिल अग्रवाल विषेश रूप से उपस्थित थे। 
वक्ताओं का श्री सुनील जैन, श्री नितीन गरूड़, डॉ. विनोद बैरागी और श्री पुष्कर बाहेती द्वारा शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। 
व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत पूर्व विधायक श्री रामलाल मालवीय, पूर्व जनपद  
अध्यक्ष श्री रामेश्वर पटेल, श्री वीरसिंह राणा, श्री जगदीश श्रीवास्तव, श्री के.सी. खण्डेलवाल, श्री राधेश्याम दुबे, श्री एल.पी. गौतम, डॉ.मालाकार गुरूजी, श्री रशीदउद्दीन एड्व्होकेट ने किया। 
स्वागत उद्बोधन आभार संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ जी ने दिया। संचालन श्रीमती करूणा गर्गे ने किया तथा ने माना। 

सच के साथ संवाद होना जरूरी है - श्री राजेश बादल

03-Oct-2018,11:54:12,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सच के साथ संवाद होना जरूरी है - श्री राजेश बादल 
श्री संदीप कुलश्रेष्ठ और डॉ. चन्दर सोनाने की पुस्तकों का हुआ विमोचन।
उज्जैन। गांधीजी जैसा अद्भुत संप्रेषण दुनिया में कोई नहीं कर सकता है। मीडिया का सच के साथ संवाद होना बहुत आवश्यक है। समाज में हो रही घटनाओं को सच के साथ सामने रखने कार्य मीडिया का होता है। महात्मा गांधी ने कभी भी दबाव की पत्रकारिता नहीं की है। उनका हमेशा मानना था कि जैसा हम सोचें, वैसी ही पत्रकारिता हम करें। वर्तमान में मीडिया पर इतना दबाव नहीं जितना गांधी को पत्रकारिता करते समय झेलना पड़ा था।  जिस व्यक्ति के कपड़ों का मजाक उड़ाया जाता था, उनकी सादगी का मज़ाक उड़ाया जाता था, उन्हें ट्रेन में सफर करने योग्य नहीं माना जाता था उस दौर में गांधी ने निर्भिक पत्रकारिता की एक मिसाल रखीं जो आज की मीडिया के लिए एक आदर्श है। उक्त विचार राज्य सभा चैनल के पूर्व कार्यकारी निदेशक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेष बादल ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के छटे दिवस ‘गांधीजी की पत्रकारिता कल और आज’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। राजेश बादल जी ने कहा कि आज संपादक नाम की संस्था में गिरावट हुई है। इस गिरावट को कैसे दूर किया जाए इसका समाधान यदि हम ढूंढे तो वह हमें गांधी की पत्रकारिता में मिलेगा। गांधी और हिन्दुस्तान एक दुसरे का प्रतिबिंब है। 
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में इंडिया टुडे के पूर्व संपादक एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विष्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति श्री जगदीश उपासने ने ‘मीडिया और भारतीयता’ विषय पर कहा कि संस्कृति राष्ट्र की आत्म का श्रृंगार होती हैं यदि संस्कृति बचेगी तो संस्कार भी बचेंगे। लगन और समर्पण भाव से किया गया कार्य हमेशा सही परिणाम देता है। यदि हम समर्पण भाव से महात्मा गांधी के आदर्शो को मीडिया तक पहुंचा पाते है तो निष्चित रूप से यह मीडिया जगत के लिए एक वरदान होगा। गांधी द्वारा पत्रकारिता को आरंभ करने का सबसे बड़ा उद्देश्य यहीं था कि वह भारत की अस्मियता को बचाना चाहते थे। भारत का ज्ञान, बुद्धि, श्रम, कौषल सभी कुछ अंग्रेज लेकर चले गये। हमें इन्हें पुनः लौटाकर भारतीय पत्रकारिता को एक आदर्ष स्वरूप प्रदान करना होगा। 
इस अवसर पर श्री संदीप कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘ भारत में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और न्यू मीडिया’’ तथा डॉ. चंदर सोनाने द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘देष, समाज और संस्कृति’’ का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार एंव राज्यसभा चेनल के पूर्व कार्यकारी निदेषक श्री राजेष बादल एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति श्री जगदीष उपासने द्वारा किया गया। समारोह के मुख्य वक्ता श्री राजेष बादल ने कहा कि श्री संदीप कुलश्रेष्ठ में समय से पार देखने की क्षमता है जो एक पत्रकार का प्रमुख गुण है। सच को समाज के सामने रखने की कला और साहस एक पत्रकार में होना चाहिए जो श्री संदीप कुलश्रेष्ठ में है। श्री संदीप कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित पुस्तक की भूमिका भी श्री राजेष बादल ने ही लिखी है। श्री राजेष बादल ने डॉ. चन्दर सोनाने को भी पुस्तक विमोचन के लिए बधाई प्रेषित की। 
 व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत  नगरनिगम सभापति श्री सोनू गेहलोत, इंडिया टूडे के पत्रकार श्री महेष शर्मा, टाईम्स ऑफ इंडिया के श्रभ् संदीप वत्स, श्री भुपेन्द्र भूतड़ा, श्री शैलेन्द्र राठी, श्री योगेन्द्र कुल्मी, श्री शैलेन्द्र कुल्मी, श्री अजय पटवा, श्री महेष पडियार ने किया। स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने दिया। 
वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन डॉ गिरीष पण्ड्या ने किया तथा आभार संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ जी ने माना। 

अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 2 अक्टूबर 2018 मंगलवार के व्याख्यान : 
षोडष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 2 अक्टूबर 2018 को सांय 5 बजे से गच्छादिपति आचार्य श्रीमद् विजय नित्यसेन सू.म.सा. ‘समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका’ विषय पर अपना व्याख्यान देंगे तथा अध्यक्षीय उद्बोधन छत्तीसगढ़ से ज्ञानतत्व के संपादक श्री बजरंग लाल अग्रवाल ‘वर्तमान सामाजिक समस्याऐं और अहिंसक तरीके से समाधान विषय पर देंगे। 

महिलाओं के लिए अनुकुल वातावरण निर्मित करना होगा - डॉ. राकेश कुमार गुप्ता

30-Sep-2018,20:05:44,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सादर प्रकाशनार्थ, 

महिलाओं के लिए अनुकुल वातावरण निर्मित करना होगा - डॉ. राकेश कुमार गुप्ता 
उज्जैन। महिला सशक्तिकरण की बातें हम लोग बहुत करते है किन्तु सच तो यह भी है कि आज भी महिलाऐं पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं है। हमें महिलाओं को एक ऐसा अनुकुल वातावरण देना होगा जो उनकी योग्यताओं और क्षमताओं के अनुरूप हो। यदि हम ऐसा कर पाते है तो निश्चित रूप से महिलाऐं और अधिक बेहतर रूप से राष्ट्रनिर्माण की दिशा में कार्य कर सकेंगी। महिलाओं को शिक्षित करने की दिशा में हमें महत्वपूर्ण कदम उठाना होंगे। उक्त विचार पूर्णिमा यूनिवर्सिटी, जयपूर के प्रोफेसर डॉ राकेश कुमार गुप्ता ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के पंचम दिवस ‘महिला सशक्तिकरण : आधुनिक भारत में महिलाओं की भूमिका एवं प्रबंधन में योगदान’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। डॉ. राकेश कुमार गुप्ता ने कहा कि यदि कल्पना चांवला को घर से बाहर नहीं निकलने दिया होता तो वह कभी अंतरिक्ष में नही पहुंच पाती। विदेष में कई ऐसे शीर्ष पद है जिन पर भारतीय महिलाऐं ही आसीन होकर पूरा प्रबंधन संभाल रही है। 
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में अभ्यास मण्डल इन्दौर के अध्यक्ष श्री मुकुन्द कुलकर्णी ने कहा कि देश में बाल अपराध के घटनाक्रम तेजी से बढ़ रहे है। हमें इस दिशा में चिंतन करते हुये संवेदनशील बनना होगा और ऐसे घटनाक्रमों के खिलाफ आवाज उठाना होगी। पर्यावरण नष्ट होता जा रहा है। युवाओं में नषे की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। ऐसे में हमें गांधी की ओर लौटना होगा। हमें गांधी की पूजा नहीं करना है बल्कि गांधी को आत्मसात करना है। यदि हमनें गांधी की पूजा शुरू कर दी तो वह सिर्फ औपचारिकता मात्र रह जाएगा इसलिए हमें गांधी के मार्ग पर चलना ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमें जो आजादी प्राप्त हुई है उसमें कहीं सघर्ष का सामना किया गया है। हमें ऐसी आजादी को अक्षुण्ण रखना चाहिए। 
विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. शैलेन्द्र पाराषर ने भी समारोह को संबोधित करते हुए गांधी विचार की प्रासंगिकता बताई। 
 व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत श्री लक्ष्मीनाराण परमार, श्री मथुराप्रसाद शर्मा, श्री विमलेन्दु घोष, श्री सुधीर श्रीवास्तव, श्री कुलदीप कुशवाह एवं श्री मोहसिन खान पठान ने किया। स्वागत उद्बोधन संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। 
इस अवसर पर भारतीय प्राथमिक वि़द्यालय के विद्यार्थियों द्वारा पर्यावरण बचाव की थीम पर आकर्षक प्रस्तुतियां दी गई। वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन श्री दिलीप सिसौदिया ने किया तथा आभार वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर जी ने माना। 


व्याख्यानमाला में होगा पुस्तकों का विमोचन : 
कल दिनांक 1 अक्टूबर 2018 सोमवार को सद्भावना व्याख्यानमाला के मंच पर श्री संदीप कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘ भारत में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और न्यू मिडिया’’ तथा डॉ. चंदर सोनाने द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘ देश, समाज और संस्कृति’’ का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार एंव राज्यसभा चेनल के पूर्व कार्यकारी संपादक श्री राजेश बादल एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति श्री जगदीश उपासने द्वारा किया जायेगा। 

अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 1 अक्टूबर 2018 सोमवार के व्याख्यान : 

षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 1 अक्टूबर 2018 सोमवार को सांय 5 बजे से वरिष्ठ पत्रकार एंव राज्यसभा चेनल के पूर्व कार्यकारी संपादक श्री राजेश बादल मुख्य वक्ता के रूप में ‘गांधी जी की पत्रकारिता कल और आज’ विषय पर व्याख्यान देंगे एवं समारोह की अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति श्री जगदीश उपासने  ‘मिडिया और भारतीयता’ विषय पर अपना व्याख्यान देंगे ।

महामना का चिन्तन हमें सामाजिक समरसता की ओर ले जाता है- डॉ. सुनील कुमार पाण्डेय

30-Sep-2018,16:24:13,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

उज्जैन। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें महामना ने अपने विचार और आदर्श प्रस्तुत न किये हो। चाहे बात सामाजिक क्षेत्र की हो या धार्मिक क्षेत्र की, शैक्षणिक क्षेत्र की हो या राजनीतिक क्षेत्र की।  प्रत्येक क्षेत्र में महामना के विचार हमारे लिए एक अमुल्य धरोहर है। महामना का चिन्तन हमें सामाजिक समरसता की ओर ले जाता है। मनुष्यता के सच्चे पुजारी रहे महामना हमेशा दुसरों के दुःख को अनुभव करना चाहते थे। उनमें इतनी बैचेनी होती थी कि वे दुसरों का कष्ट महसूस करने के लिए कोई माध्यम की कल्पना करते थे कि जिससे वे दूसरों के भीतर प्रवेश होकर उनके दुःख को महसूस कर सके। उक्त विचार लखनऊ विश्वविद्यालय सांख्यिकी विभाग के प्रोफेसर एण्ड हेड और महामना के पारिवारिक सदस्य डॉ. सुनील कुमार पाण्डेय ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के चतुर्थ दिवस ‘सामाजिक समरसता तथा विकास-महामना का दृष्टिकोण वर्तमान परिप्रेक्ष्य में’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। डॉ. सुनील कुमार पाण्डेय जी ने कहा कि स्वशासन मानव समाज का सामाजिक आधार है। पं. मदनमोहन मालवीय जी ने राष्ट्र की परिभाषा दी है जो हम सभी को समझना चाहिए। महामना हमेशा से ही यह मानते थे कि जिसने सांसारिक मोहमाया को जीत लिया है वही सच्चे अर्थो में लोक सेवक बनने के लायक है। हाल ही में आने वाले चुनाव में मतदान करते हुये हमें ऐसे ही लोक सेवकों को चुनना होगा। 

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मे ‘21वीं सदी में गांधी की प्रासंगिकता ’ विषय पर उद्बोधन देते हुए मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के इनकमटेक्स्ट कमीश्नर श्री आर.के. पालीवाल ने कहा - हमने गांधी को सिर्फ खादी तक सिमित कर लिया है जबकि गांधी का व्यक्तित्व बहुत ही व्यापक है। उस दौर में जब लोगों के तन पर पहनने को कपड़े नहीं होते थे तब गांधी ने खादी का विचार दिया था। वर्तमान दौर में जब घरों में एक-एक व्यक्ति के पास बीस-बीस जोड़ी कपडे़ है ऐसे में गांधी को प्रासंगिक बनाने के लिए हमें गांधी को खादी से ऊपर उठ कर सोचना होगा। यदि आज पर्यावरण सुरक्षित है, यदि आज हम सब संस्कारित हो गये है, यदि हम सभी में सद्भावना व्याप्त है तो ही हम कह सकते है कि गांधी की प्रासंगिकता नहीं है। किन्तु स्थिति इसके विपरित है। हमें गांधी दर्शन से पर्यावरण, संस्कार, सद्भावना को सहजना होगा। उस समय जो नदियां थी उनमें से कई अब नाले बन चुकी हैं और यदि हमनें गांधी के विचारों को नहीं अपनाया तो भविष्य में नर्मदा, गंगा, क्षिप्रा जैसी नदियां भी नाले के रूप में परिवर्तित हो सकती है। 

विशिष्ट अतिथि गांधी ट्रस्ट नई दिल्ली के श्री दयाराम नामदेव जी थे। व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत श्री नीतिन गरूड़, श्री अजय जैन, श्री प्रशांत शर्मा, श्री निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव, श्री उद्धव जोशी, श्री नातूलाल जोशी, श्री प्रभाकर कुलकर्णी एवं नंदकिशोर तांडी ने किया। स्वागत उद्बोधन संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। 
इस अवसर पर वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन संस्था निदेशक सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ ने किया तथा आभार वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर जी ने माना। 

अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 30 सितम्बर 2018 रविवार के व्याख्यान
षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 30 सितम्बर 2018 को सांय 5 बजे से डॉ. राकेश कुमार गुप्ता प्रोफेसर, पूर्णिमा यूनिवर्सिटी, जयपूर ‘महिला सशक्तिकरण : आधुनिक भारत में महिलाओं की भूमिका एवं प्रबंधन में योगदान’ विषय पर अपना व्याख्यान देंगे 

दुःख के समय में भी खुशियों को ढूंढते आना चाहिए - ब्रिगेडियर पी.डी. तिवारी

29-Sep-2018,12:01:55,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

उज्जैन। जो समाज स्वस्थ्य है वहीं विकास के पद पर गति करता है। सुख और दुख तो जीवन के अभिन्न अंग है जिनका आना जाना लगा रहता है। हमें चाहिए कि दुःख की घड़ी में भी हम खुशियों को ढुंढ ले। स्वस्थ्य रहने के लिए खुश रहना बहुत ही अनिवार्य हैं। यह तभी संभव हो सकता है जब हमारे विचार सकारात्मक हो। शोध के आंकड़ें कहते है कि हमारे मस्तिष्क में एक मिनिट में लगभग 10 से 15 विचार आते है और उनमें से नब्बे प्रतिषत विचार नकारात्मक विचार होते है। हमें इन आंकड़ों को बदलने के प्रयास करना चाहिए। उक्त विचार ब्रिगेडियर पी.डी. तिवारी जी, नई दिल्ली ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यान माला के तीसरे दिवस ‘हेप्पी एण्ड हेल्दी लाईफ’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री पी.डी. तिवारी ने कहा कि पुस्तकें हमें नवीन ऊर्जा और दिशा देती है इसलिए पुस्तकों का वाचन हमें करते रहना चाहिए। दुनिया की सबसे अच्छी किताब हम स्वयं है। स्वयं को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। प्रेम, त्याग, सहायता और धैर्य जैसे महत्वपूर्ण गुणों को हमे आत्मसात करना चाहिए। मेरे जीवन में भी एक क्षण आया था जब देश की रक्षा कार्य के दौरान मेरा हेलीकाप्टर जमीन से कुछ ऊंचाई पर क्रेश हो गया था और मैं गंभीर रूप से घायल था किन्तु जब भी मैने अपने सकारात्मक रवैये को कायम रखते हुये चेहरे पर हंसी बनाए रखी। अस्पताल में इलाज के दौरान मेरी यह मुस्कुराती तस्वीर ने सबको आश्चर्य चकित भी किया था और ऊर्जा से भी भरा था।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मे ‘ वैष्वीकरण के युग में नैतिक मूल्यों की व्यापकता एवं उपयोगिता’ विषय पर उद्बोधन देते हुए भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिसर, लखनऊ की निदेषक डॉ. पूजा व्यास ने कहा - कि नैतिक मूल्य समाज की नींव है। वहीं समाज आगे बड़ता हैं जो नैतिकता के महत्व को स्वीकारा है। नैतिकता हमारे आचरण का आधार है। वर्तमान में हम भौतिक लालसा की ओर अग्रसर हो रहे है। यही कारण है कि हम हमारे मूल्यों को बहुत हद तक पीछे छोड़ चुके है। यह शास्वत सत्य है कि अहिंसा, नैतिकता, सादगी और मानवता ही लोगों को जोड़कर रख सकते है। हमें दुनिया को यह एहसास कराने का समय आ पहुंचा है कि यह देश विवेकानन्द जैसे महापुरूषों का देष है। 
व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत श्री महेश सिंहल, श्री मोहन नागर, श्री सतीश श्रीवास्तव, श्रीमती उर्मिला कुलश्रेष्ठ, डॉ. पुष्पा चौरसिया, श्री निर्भय सिंह बेस, श्री एस.के. माथुर एवं श्रीमती अचला जौहरी ने किया। स्वागत उद्बोधन संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। 
इस अवसर पर वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन सुश्री दृष्टि चांवड़ा ने किया तथा आभार वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने माना। 

अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 29 सितम्बर 2018 शनिवार के व्याख्यान
षोडष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 29 सितम्बर 2018 को सांय 5 बजे से डॉ. सुनील कुमार पाण्डेय, प्रोफेसर एवं हेड सांख्यिकी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, ‘सामाजिक समरसता तथा विकास- महामना का दृष्टिकोण वर्तमान परिप्रेक्ष में’ विषय ‘पर अपना व्याख्यान देंगे एवं अध्यक्षता करते हुये श्री आर.के. पालीवाल, आई.टी. कमीश्नर, म.प्र. एवं छ.ग. ‘21वीं सदी में गांधी की प्रांसगिकता ’ विषय पर  व्याख्यान देंगे। 

उज्जैन। जो समाज स्वस्थ्य है वहीं विकास के पद पर गति करता है। सुख और दुख तो जीवन के अभिन्न अंग है जिनका आना जाना लगा रहता है। हमें चाहिए कि दुःख की घड़ी में भी हम खुशियों को ढुंढ ले। स्वस्थ्य रहने के लिए खुश रहना बहुत ही अनिवार्य हैं। यह तभी संभव हो सकता है जब हमारे विचार सकारात्मक हो। शोध के आंकड़ें कहते है कि हमारे मस्तिष्क में एक मिनिट में लगभग 10 से 15 विचार आते है और उनमें से नब्बे प्रतिषत विचार नकारात्मक विचार होते है। हमें इन आंकड़ों को बदलने के प्रयास करना चाहिए। उक्त विचार ब्रिगेडियर पी.डी. तिवारी जी, नई दिल्ली ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यान माला के तीसरे दिवस ‘हेप्पी एण्ड हेल्दी लाईफ’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री पी.डी. तिवारी ने कहा कि पुस्तकें हमें नवीन ऊर्जा और दिशा देती है इसलिए पुस्तकों का वाचन हमें करते रहना चाहिए। दुनिया की सबसे अच्छी किताब हम स्वयं है। स्वयं को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। प्रेम, त्याग, सहायता और धैर्य जैसे महत्वपूर्ण गुणों को हमे आत्मसात करना चाहिए। मेरे जीवन में भी एक क्षण आया था जब देश की रक्षा कार्य के दौरान मेरा हेलीकाप्टर जमीन से कुछ ऊंचाई पर क्रेश हो गया था और मैं गंभीर रूप से घायल था किन्तु जब भी मैने अपने सकारात्मक रवैये को कायम रखते हुये चेहरे पर हंसी बनाए रखी। अस्पताल में इलाज के दौरान मेरी यह मुस्कुराती तस्वीर ने सबको आश्चर्य चकित भी किया था और ऊर्जा से भी भरा था।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मे ‘ वैष्वीकरण के युग में नैतिक मूल्यों की व्यापकता एवं उपयोगिता’ विषय पर उद्बोधन देते हुए भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिसर, लखनऊ की निदेषक डॉ. पूजा व्यास ने कहा - कि नैतिक मूल्य समाज की नींव है। वहीं समाज आगे बड़ता हैं जो नैतिकता के महत्व को स्वीकारा है। नैतिकता हमारे आचरण का आधार है। वर्तमान में हम भौतिक लालसा की ओर अग्रसर हो रहे है। यही कारण है कि हम हमारे मूल्यों को बहुत हद तक पीछे छोड़ चुके है। यह शास्वत सत्य है कि अहिंसा, नैतिकता, सादगी और मानवता ही लोगों को जोड़कर रख सकते है। हमें दुनिया को यह एहसास कराने का समय आ पहुंचा है कि यह देश विवेकानन्द जैसे महापुरूषों का देष है। 
व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत श्री महेश सिंहल, श्री मोहन नागर, श्री सतीश श्रीवास्तव, श्रीमती उर्मिला कुलश्रेष्ठ, डॉ. पुष्पा चौरसिया, श्री निर्भय सिंह बेस, श्री एस.के. माथुर एवं श्रीमती अचला जौहरी ने किया। स्वागत उद्बोधन संस्था चेयरमेन एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। 
इस अवसर पर वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन सुश्री दृष्टि चांवड़ा ने किया तथा आभार वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने माना। 

अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 29 सितम्बर 2018 शनिवार के व्याख्यान
षोडष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 29 सितम्बर 2018 को सांय 5 बजे से डॉ. सुनील कुमार पाण्डेय, प्रोफेसर एवं हेड सांख्यिकी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, ‘सामाजिक समरसता तथा विकास- महामना का दृष्टिकोण वर्तमान परिप्रेक्ष में’ विषय ‘पर अपना व्याख्यान देंगे एवं अध्यक्षता करते हुये श्री आर.के. पालीवाल, आई.टी. कमीष्नर, म.प्र. एवं छ.ग. ‘21वीं सदी में गांधी की प्रांसगिकता ’ विषय पर  व्याख्यान देंगे। 

निःस्वार्थ सेवाभाव ही हमारी संस्कृति है - श्री के.पी. डोगरा

27-Sep-2018,16:51:25,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

उज्जैन। भारत की संस्कृति निःस्वार्थ सेवाभाव प्रधान संस्कृति है। हमारे यहां बालक के जन्म लेने के बाद उसे संस्कारों के रूप में निस्वार्थ सेवा का भाव सिखाया जाता है। मानवता की निःस्वार्थ सेवा प्रत्येक युग में हुई है। हमारे देश की आजादी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निःस्वार्थ भाव से किये गये संघर्ष का परिणाम है। गांधी ने निःस्वार्थ सेवा भाव के लिए नये मूल्य और आदर्श स्थापित किये है। वर्तमान में हमारी महान संस्कृति में कुछ विकृति जरूर आई है और इसीलिए निःस्वार्थ सेवा का भाव कम होता जा रहा है। हमें फिर से महात्मा गांधी के जीवन दर्शन की ओर लौटना होगा। कई और उदाहरण है जो हमें निःस्वार्थ सेवा भावकी प्रेरणा देते है। भगतसिंह जी के मन में यह निःस्वार्थ भाव से देश की सेवा करने की प्रेरणा थी जिसके चलते जब उनसे पूंछा जाता कि आपने अभी तक विवाह क्यों नहीं किया हैं तो उनका जवाब होता था कि मैने तो अपने देष की आजादी से ही विवाह कर लिया है। उक्त विचार प्रशांति धाम, नई दिल्ली के अध्यक्ष श्री के.पी. डोगरा जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कवि कुलगुरू डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ स्मुति षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यान माला के दूसरे दिवस पर ‘मानवता की निःस्वार्थ सेवा’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये। श्री के.पी. डोगरा ने कहा कि मदर टेरेसा की निःस्वार्थ सेवा भाव से सम्पूर्ण विष्व प्रेरणा लेता है। उन्होंने गरीबों, लाचारो, पीड़ितों और दिन दुखियों की जो सेवा की है वह निःस्वार्थ सेवा भाव का ही उदाहरण है। निःस्वार्थ सेवा सच्चे दिल से किये जाने वाली सेवा है जो दुसरों के हितों के लिए की जाती है। समाज में यदि सद्भावना कायम करना है तो वह निःस्वार्थ सेवाभाव से ही आ सकती है। हमें उन कारणों को खोजना होगा जिनसे हम निःस्वार्थ सेवा के भाव से दूर होते जा रहे है। हमें अपनी जिम्मेदारी बेहतर रूप से निभाना होगी। 
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने कहा - कि समाज में सद्भावना के मूल मंत्र को स्थापित करने का दायित्व हम सभी का है। हम भविष्य में एक उन्नत भारत देखना चाहते है तो हमें युवा पीढ़ी में सद्भावना का समावेश करना होगा। परस्पर जोड़ने की बातें उन्हें सीखाना होगी। 
इस अवसर पर भारतीय विद्यालय के विद्यार्थियों ने बालश्रम न होने के प्रति जागरूक करती एक प्रस्तुती मुकाभिनय के रूप में प्रस्तुत की।
व्याख्यानमाला के आरंभ में संस्था की छात्राओं ने सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत श्री क्रांतिकुमार जी वैद्य, श्री रमेश चन्द्र जोशी, डॉ. एच.एल. महेश्वरी, डॉ. शैलेन्द्र पराषर और डॉ. शिव चौरसिया ने किया। स्वागत उद्बोधन राष्ट्रभारती शिक्षा महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. रश्मि शर्मा ने किया। 
इस अवसर पर वक्ताओं का शाल और श्रीफल से सम्मान किया गया। संचालन डॉ. सीमा दुबे ने किया तथा आभार संस्थाध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने माना। 
अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 28 सितम्बर 2018 शुक्रवार के व्याख्यान
षोडश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला दिनांक 28 सितम्बर 2018 को सांय 5 बजे से नई ब्रिगेडियर पी.डी. तिवारी (नई दिल्ली) ‘ हेप्पी एण्ड हेल्दी लाईफ’ विषय पर अपना व्याख्यान देंगे एवं अध्यक्षता करते हुये डॉ. पूजा व्यास (लखनऊ) ‘वैश्वीकरण के युग में नैतिक मूल्यों की व्यापकता और उपयोगिता’ विषय पर  व्याख्यान देंगी। 

श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ अमृत महोत्सव एवं षोडश अ भा सद्भावना व्याख्यानमाला २०१८

27-Sep-2018,15:52:55,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

80 से अधिक संस्थाओं द्वारा कर्मयोगी कृष्णमंगल का अमृताभिनन्दन सम्पन्न

कर्मयोगी कृष्णमंगल आज समाज की आवश्यकता  है-डॉ. एस.एन. सुब्बराव 
उज्जैन। कर्मयोगी वह होते है जो कर्मफल की चिन्ता किये बिना निरंतर समाज हित में कर्म करते रहते है। श्री कृष्णमंगल सिंह जी कुलश्रेष्ठ जी भी एक ऐसे व्यक्तित्व है जिन्होंने शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान की दिशा में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे व्यक्तित्व वर्तमान समाज की आवश्यकता है जो गांधी विचारों को आज भी अपने कृतित्व से युवा पीढ़ी तक पहुंचा रहे है। उक्त विचार वरिष्ठ गांधीवादी डॉ. एस.एन. सुब्बराव ने भारतीय ज्ञानपीठ में वरिष्ठ गांधीवादी, शिक्षाविद और समाजसेवी श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के जीवन के 80वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ (माधवनगर रेलवे स्टेशन के सामने, फ्रीगंज उज्जैन) में आयोजित अमृत महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये। डॉ. एस.एन. सुब्बराव ने कहा - कि ऐसे व्यक्तित्व के कर्म अपने आप में एक तपस्या होते है और ऐसे कर्मों से हमें निरन्तर प्रेरणा लेते रहना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व महाधिवक्ता श्री आनन्दमोहन माथुर ने कहा कि श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने हमेषा निष्ठा और समर्पण के साथ समाज की सेवा की है। समाज में सद्भावना कायम करने की दिषा में वे एक मिसाल है। 
इस अवसर पर शहर की विभिन्न 80 से अधिक संस्थाओं द्वारा श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ अमृताभिनन्दन किया गया एवं विभिन्न गणमान्य नागरिकों के द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन भी किया गया। संभागीय सर्तकता समिति के अध्यक्ष श्री शशिमोहन श्रीवास्तव, अ.भा. कायस्थ महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष श्री अशोक श्रीवास्तव, आयुर्वेद महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य, डॉ. यू.एस. निगम, वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर एवं साई फाउण्डेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष की के.पी. डोगरा जी ने भी शुभकामना व्यक्त की। 
अमृत महोत्सव में श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के तुलादान की विधि सम्पन्न हुई जिसमें उन्हें मिठाईयों एवं फलों से तोला गया। इस अवसर पर श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के जीवन चरितत्र पर आधारित एक गं्रथ ‘‘कर्मयोगी कृष्णमंगल ’’ का लोकार्पण भी किया गया। 
श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ के जीवन दर्शन पर आधारित एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी इस अवसर पर किया गया। समिति की ओर से श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ को एक अभिनन्दन पत्र भी भेंट किया गया एवं शाल व श्रीफल से उनका सम्मान भी किया गया।
इस अवसर पर श्रीकृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने अपना संदेश देते हुए कहा कि आप सभी के अपार प्रेम और विश्वास का परिणाम है कि मैं अपने जीवन में तय किये उद्दश्यों की पूर्ति कर पा रहा हूं । समाजहित, नारी सशक्तिकरण की दिशा में कई और महत्वपूर्ण कार्य है जो निरंतर किये जाना है। 
इस अवसर पर कर्मयोगी कृष्णमंगल गं्रथ के संपादक मंडल सदस्य डॉ. रमेश दीक्षित, डॉ. शिव चौरसिया, श्री श्रीराम दवे, डॉ. पिल्केन्द्र अरोरा, डॉ. चन्दर सोनाने, श्री अक्षय अमेरिया, श्री संदीप कुलश्रेष्ठ, श्री पुष्कर बाहेती, श्री सिद्धार्थ जैन, डॉ. राजेन्द्र सक्सेना, श्री अनिल गुप्ता का सम्मान भी किया गया। 
संचालन महाविद्यालयीन निदेशक डॉ. गिरीश पण्ड्या ने किया। 


अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला में कल दिनांक 27 सितम्बर 2018 गुरूवार के व्याख्यान
सोलहवीं अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला दिनांक 27 सितम्बर 2018 को सांय 5 बजे से प्रंशाति धाम, नई दिल्ली के ट्रस्टी श्री के.पी. डोगरा जी द्वारा ‘ मानवता की निस्वार्थ सेवा’ विषय पर व्याख्यान दिया जायेगा। 

Press Note Day 7

30-Oct-2017,19:57:18,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

वसुधैव कुटुम्बकम लोकतन्त्र का आधार है- सुश्री मीनाक्षी नटराजन

उज्जैन। भारतीय दर्शन में वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव प्रमुखता से है। वास्तव में वसुधैव कुटुम्बकम् ही लोकतंत्र का मजबूत आधार है। हमारें वेदों और उपनिषेदों में प्रत्येक संस्कृति को समाहित करने की बात कहीं गई है। जिस प्रकार नमक के पानी में घुल जाने के पश्चात् दुनिया की कोई भी विज्ञान प्रयोगशाला यह भेद नहीं कर सकती है कि नमक का कौन-सा कण पानी की किस बूँद से मिला है, उसी प्रकार हमें भी सभी के विचारों को एक मत में इस प्रकार समाहित करना चाहिए कि विचारों का भेद समाप्त हो जाए। यहीं भाव वसुधैव कुटुम्बकम् है। वर्तमान समाज में मनुष्यों के भीतर तो इतनी पाश्विकता व्याप्त हो चुकी है, कि इतनी पाश्विकता तो पशुओं में भी नहीं होगी। पशु जाति में तो लड़ाई सिर्फ पेट के लिए होती है किन्तु मनुष्यां में तो स्वार्थ पूर्ति की लड़ाईयाँ हो रही है। हमारी धरती तो जय जगत की धरती है। हमें इसके महत्व को समझते हुए आपसी द्वेष, वैमनस्य, हिंसा के भाव को त्याग कर सभी के प्रति सम्मान का भाव जागृत करना चाहिए। वसुधैव कुटुम्बकम् का ऐसा समाज निश्चित रूप से प्रेम, स्नेह और सौहाद्र से ओत-प्रोत होगा। यह भाव हमें रखना होगा कि ईश्वर का निवास प्रत्येक जीव में है और जीवों में कोई बड़े या छोटे का भेद-भाव नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् में भय का कोई स्थान नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् तो सिर्फ प्रेम और करूणा के माध्यम से लाया जा सकता है। हम सब मिलकर यह प्रण करे कि आज विचारों से व्यक्त वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव को हम सिर्फ अपने आचरण में लायेगे बल्कि जन-जन तक भारतीय संस्कृति के इस मूल मंत्र को पहुंचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। उक्त विचार  ख्यात राजनीतिज्ञ सुश्री मीनाक्षी नटराजन ने ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम ही भारतीय समाज का आधार है’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विद्युत्प्रभा जी .सा. ने ‘‘नारी अपने गौरव को पहंचाने’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नारी ने अपने आचरण से ऊँचाईयों को प्राप्त किया है। जब हम नारी की तुलना पुरूष के कार्यां से करते है तो ऐसा करते वक्त वास्तव में नारी के महत्व को पुरूष से कम आंकते है। हमें नारी को नारी के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए। नारी की तुलना यदि करना ही हो तो वह सिर्फ धरती से ही की जा सकती। नारी में वह शक्ति है जो अपने व्यवहार से संसार को स्वर्ग बना सकती है। नारी ही है, जो परिवार को एकजुट करके रखती है।

                समारोह के विशिष्ट वक्ता सांई फाउण्डेषन इंडिया के अध्यक्ष श्री के.पी. डोंगरे ने ‘‘मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिग्री तो हमें महाविद्यालयों से मिल जाती है किन्तु सच्चे मूल्य हमें परिवार द्वारा दिये गए संस्कार से ही प्राप्त होते है। सेवा, त्याग, धर्म, प्रेम जैसे गुणां का समावेश माँ द्वारा ही बच्चों में किया जाता है। संयुक्त परिवारों में ही भारतीय जीवन मूल्यों की आत्मा बसती है। हमें परिवारों का विघटन नहीं होने देना चाहिए। हमे दिमाग का उपयोग करके चांद पर पहुंच सकते है, किन्तु जीवन मूल्य मजबूत होना बहुत आवश्यक है और ऐसे महान मूल्यों का युवा पीढ़ी में कायम रखना हमारे द्वारा दी गई एवं शैक्षणिक संस्थाओं में दी गई शिक्षाओं का मूल दायित्व होना चाहिए।

                समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे।

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री महेशचन्द्र सोनी, श्रीमती चमेली देवी पटेरिया, श्री राधेश्याम दुबे, श्री ब्रजेन्द्र द्विवेदी, उमाशंकर मिश्रा, श्रीमती चन्द्रकला नाटानी, श्रीमती नुसरत खान, ने किया।

                                संचालन डॉ. नीलम महाडिक ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 6

29-Oct-2017,20:05:13,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सिक्ख पंथ की बुनियाद ही सद्भावना है - डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा

उज्जैन। सिक्ख पंथ संस्थापक गुरूनानक देव जी स्वयं सद्भावना के संत थे। उनका उद्देष्य किसी पंथ को स्थापित करने का नहीं था किन्तु उनके विचारों और आदर्षो से प्रभावित होकर विभिन्न धर्मो के लोग उनसे जुड़ते गए और इस प्रकार सिक्ख पंथ की बुनियाद रखी गई अर्थात् सिक्ख पंथ की बुनियाद ही अपने आप में एक सद्भावना है। गुरूनानक देव जी का मानना था कि ईश्वर एक है, शाष्वत है, सत्य है। ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग गुरू से ही संभव है। इसलिए सिक्ख पंथ में गुरू द्वारा और गुरूवाणी का महत्व है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर अपने आप में सद्भावना का प्रतीक है। सिक्ख पंथ ने हमेषा वासुधैव कुटुम्बकम पर विष्वास किया है। सिक्ख पंथ के अनुयायियों ने कई बावड़ियों का निर्माण कराया है। यह भी समाज में सद्भावना कायम करने के लिए ही था क्योंकि नदियों के घाट तो भेद-भाव उत्पन्न कर सकते है किन्तु बावड़ियों में घाट नहीं होते हैं और वहां सभी लोग एक साथ मिलकर पानी का उपयोग कर सकते है। सिक्ख पंथ के दो प्रमुख आदर्ष सेवा और सिमरन है किन्तु इनके प्रचार -प्रसार और प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। गुरूगं्रथ साहब अपनेआप में सद्भावना का एक बड़ा उदाहरण है जिसमें छः गुरूओं की वाणी सहित हिन्दु, मुस्लिम, क्षत्रिय सहित कई धर्मां के सतों की वाणी समाहित हैं। संगत और पंगत ये सिक्ख पंथ के दो आदर्श हैं और इनके मूल में भी सद्भावना का भाव कायम है। संगत का अर्थ होता है -साथ सिक्ख पंथ में एक साथ रहने के लिए धर्मशालाओं का संचालन होता हैं और पंगत का अर्थ होता है - एक साथ बैठकर भोजन प्रसाद ग्रहण करना। इस हेतु सिक्ख पंथ में लंगर का संचालन होता है। विचार कीजिए जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं तो परिवार के मुखियां को खुषी होती हैं और यदि हजारों लोग एक साथ बैठकर भोजन प्रसादी ग्रहण करते है तो ईष्वर को कितनी खुषी होगी? यहीं सिक्ख पंथ के प्रत्येक अनुयायी में होता है। मनुष्य का शरीर पंच तत्वों से बना है। जब प्रकृति ने सभी लोगों में इन पंच तत्वों का अनुपात एक समान रखा है तो फिर हम मनुष्यों में भेद करने वाले कौन होते है? सभी जातियां, बंधनों से ऊपर उठकर मनुष्य की मनुष्य के प्रति सद्भावना कायम हो। उक्त विचार ख्यात साहित्यकार डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा ने ‘‘सिक्ख पंथ और सद्भावना’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के छटे दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए मध्यप्रदेश  के पूर्व महाधिवक्ता  श्री आनन्द मोहन माथुर  ने ‘‘वर्तमान संदर्भ में भारतीय प्रजातंत्र की दशा’’ विषय  पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक हम जातियों के बंधन को नहीं तोडे़गें तब तक प्रजातंत्र की स्थापना नहीं हो सकती यह समाज उन्नति करना चाहता है तो उसे जातियों के भेद भाव को समाप्त करना होगा। संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द लिखा गया है उसका अर्थ सहीं मायने में समझते हुए हमें एक सद्भावना पूर्ण समाज बनाना होगा। राजनीतिज्ञों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और जो बातें और जो कर्म वे करते है उसे गरिमापूर्ण बनाना होगा तभी वे समाज में एक आदर्श स्थापित कर सकते है और एक आदर्श भारतीय प्रजातंत्र की स्थापना के लिए दिशा दे सकते है।

                समारोह के विषिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे।

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत सरदार बलदेव सिंह कालरा, श्री खुशहाल सिंह बाधवा, श्री सरदार सुरेद्र सिंह अरोरा, श्री उमाशंकर मिश्रा, श्री सुधीर श्रीवास्तव एवं श्रीराम दवे ने किया।

                                संचालन श्रीमती करूणा गर्गे ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 30 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 30 अक्टुबर सोमवार को  ख्यात राजनीतिज्ञ सुश्री मीनाक्षी नटराजन  ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम ही भारतीय समाज का आधार है’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विद्युत्प्रभा बहिन जी महाराज साहब ‘‘नारी अपने गौरव को पहंचाने’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे। विशिष्ट अतिथि प्रषांति धाम के ट्रस्टी श्री के.पी. डोंगरे रहेंगे।

Press Note Day 4

28-Oct-2017,16:54:51,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

कश्मीर की स्थिति के लिए भारतीय राजनीति जिम्मेदार है  - डॉ. क्षमा कौल

उज्जैन। महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रयास किये थे और स्वतंत्रता के पहले तक कष्मीर सुरक्षित भी था। किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय राजनीति में कई ऐसे फैसले हुए जिससे कश्मीर की सुरक्षा खतरे में रही है। वहां अलगाववादियों में इतना अंतर्विरोध नही है जितना अन्तर्विरोध भारतीय राजनीति में है। स्वतंत्रता के पश्चात् कश्मीर में धारा 35 एवं धारा 370 लगाई गई जिसके दुष्परिणाम आज तक देखने को मिल रहे है। आश्चर्यजनक यह है कि भारतीय राजनीति का कोई भी दल इसे अभी तक हटा नही पाया है। वादे तो किये जाते है किन्तु यह स्वार्थ की ओर वोटो को हड़पने की राजनीति का ही परिणाम है, कि वहां ये धाराऐं हट नहीं पाई है। इन्हीं का परीणाम है कि वहां से शादी करके जाने वाली लड़कियों एवं पाक अधिकृत कश्मीर से आये हिन्दुओं को कश्मीर की नागरिकता से वंचित रहना पड़ रहा है। वहां अलगाववादि आजादी की मांग कर रहे है, कुछ अलगाववादि पाकिस्तान के साथ विलय की मांग कर रहे है और कुछ है जो स्वयं के नियमों को पालन करने की मांग कर रहे है। ये वे लोग है जो भारत से घृणा कर रहे है, भारत का विनाश और विखण्डन चाहते है। कश्मीर का अपना स्वयं का एक ध्वज है। यह भी अपने आप में भारतीय राजनीति के फैसले का ही परिणाम है। यह भारतीय संविधान उलट नही तो और क्या है? हमारा पड़ोसी राष्ट्र तो बहुत पहले से कश्मीर में हिंसा पहलाने का कार्य कर रहा है। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की सेना ने कष्मीर में आगजनी, लूटपाट, धर्म परिवर्तन, कई अमानवीय कार्य किये। यह कश्मीर का प्रथम जेहादी हमला था। उक्त विचार ख्यात साहित्यकार डॉ. क्षमा कौल ने ‘‘भारतीय राजनीति और काश्मीर’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के चतुर्थ दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए सिंहस्थ प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री निवाकर नातू ने ‘‘एकात्मवाद में विकास की संभावना’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के आदर्शो का अनुसरण करते हुए हम एकात्मवाद में विकासवाद की प्रबल संभावनाओं को समझ पायेगें। एकात्मवाद का चिंतन संपूर्ण विश्व को प्रभावित कर रहा है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए अवसरों की समानता में ही एकात्मवाद की भावना समाहित है। स्वार्थ की भावना को त्याग कर हमें परहित, लोकहित और समाजहित को सर्वपरी बनाना होगा तभी हम विकास की ओर अग्रसर हो पायेगे।         

                समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। 

                                स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह सर्वधर्म प्रार्थना के दौरान एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री नारायण मंघवानी, डॉ. पुष्पा चौरसिया, सुश्री शीला व्यासडॉ. नीलम महाडिक, डॉ. तनूजा कदरे, डॉ. रश्मि शर्मा एवं श्रीमती मीना नागर ने किया।

                                संचालन सुश्री दृष्टि चावड़ा ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 28 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 28 अक्टुबर शनिवार को  सेवानिवृत कमिश्नर मुम्बई पुलिस श्री शमशेर खान पठान ‘‘मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह एवं उसका हल’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए महर्षि सांदिपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव प्रो. विरूपक्ष वि. जड्डीपाल ‘‘वैद में विकास की अवधारणा’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

Press Note Day 2

25-Oct-2017,19:34:40,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

विचार शक्ति एक वरदान है, इसे अभिशाप नहीं बनने देना चाहिए - डॉ. श्वेता जैन

उज्जैन। मनुष्यों को विचार शक्ति एक वरदान के रूप में मिली है। हमें इस शक्ति का उपयोग सकारात्मक रूप में ही करना चाहिए, तभी सही अर्थां में जीवन निर्माण कर सकते है। यदि विचार नकारात्मक प्रवृति की ओर अग्रसर होते है तो वे अभिशाप बन जाते है। जिस प्रकार श्वास पर नियंत्रण करके स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है वैसे ही विचारों पर नियंत्रण करके सफलता को प्राप्त किया जा सकता है। सफल व्यक्ति कभी विचारों के गुलाम नहीं रहे है। विचारों में नकारात्मकता हमें अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुँचने देती। क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे अवगुण नकारात्मक विचारां को जन्म देते है। हमारे विचार जैसे होंगे वैसा ही हमारा व्यवहार भी होगा। जीवन तो सभी को मिला है, किन्तु विचार करने की शक्ति सिर्फ मनुष्यों को प्राप्त है। विचारों का प्रतिपल आना और विलिन हो जाना एक सतत् प्रक्रिया है। अभ्यास करते हुए हमें अपने विचारों को सकारात्मक दिषा देने में सफलता मिल जायेंगी। उक्त विचार दिल्ली की ख्यात षिक्षाविद् डॉ. श्वेता जैन ने ‘‘ वर्तमान युग की मांग - जीवन निर्माण’’ विषय पर भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदष .भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के द्वितीय दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।           

                समारोह की अध्यक्षता करते हुए संयुक्त सेल्स टेक्स कमिश्नर श्री गोपाल पोरवाल ने ‘‘जी.एस.टी. की देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जी.एस.टी. ने अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किये है। जी.एस.टी. के पहले विविध प्रकार के टेक्स वस्तुओं पर लगते थे। उत्पादन से विक्रय तक की यात्रा में दो केन्द्रिय एवं पांच राज्यस्तरीय कर देना होते थे किन्तु जी.एस.टी. लागू होने के पश्चात् अब सारे टेक्स एक संपूर्ण टेक्स में समा गये है। जी.एस.टी. लागू होने से उपभोक्ताओं को यह फायदा हुआ है कि वस्तुओं की कीमत कम हुई है। हालांकि यह आज हमें महसूस नहीं हो रहा है किन्तु भविष्य में यह बात हमें महसूस होगी। टेक्स के नियमों का पालन करने में जो शुल्क लगता था वह भी अब कम हुआ है। खास बात यह है कि अब व्यवस्थाऐं ऑनलाईन है। अतः टेक्स की चोरी अब नहीं हो सकती है। यद्यपि व्यापारी वर्क जी.एस.टी. टेक्स देना तो चाहता है किन्तु समस्या यह है कि उसके खातें में टेक्स देने लायक रकम फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हमें जी.एस.टी. के लिए अपने आपको तैयार करना होगा। निकट भविष्य में सरकार को जी.एस.टी. से बहुत लाभ होगा।

                                विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह प्रार्थना की विशेषता यह रही कि एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शॉल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत सुश्री शीला वैद्य, श्रीमती उर्मिला कुलश्रेष्ठ, सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ, एम.के. भटनागर, डॉ. मनीषा ठाकुर, श्री अविनाष बर्वे, श्री खुशहाल सिंह वाधवा एवं श्री कैलाष नारायण शर्माने किया।

                                संचालन डॉ. सीमा दुबे ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट  पर उपलब्ध है।

                                                        सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 26 अक्टूबर के व्याख्यान

                                अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 26 अक्टुबर गुरूवार को वर्ल्ड वि.वि. यू.के., यू.एस.. प्रोफेसर डॉ. सोहन राज तातेड़ ‘‘ सृष्टि संरक्षण की अवधारणा ’’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए उज्जैन के कलेक्टर माननीय संकेत भोण्डवे  ‘‘सामाजिक न्याय की अवधारणा’’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

 

Press Note Day 1

24-Oct-2017,19:50:43,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

सभी से मित्रवत् व्यवहार आज के समाज की आवश्यकता है - आचार्य हर्ष सागर जी म.सा.
समाज में हिंसा व वैमनस्य का दौर है। यदि इस दौर को समाप्त करना है तो अन्तर मन से सभी जीवों में एक दूसरे के प्रति आदर, स्नेह और सद्भाव होना चाहिए। सभी से मित्रवत् व्यवहार करना समाज पहली आवश्यकता है। किसी भी धर्म मेें परस्पर हिंसा की बात नही कहीं गई है बल्कि सभी धर्म एक -दूसरे का आदर करने का संदेश ही देते है। मनुष्य ने धर्म और जातिवाद को महत्व देते हुए हमारी मूल संस्कृति को भुला दिया है। समाज से संकीर्ण विचारधारा के कारण ही हम सद्भाव से दूर होते जा रहे है। विचारधारा जितनी अधिक परिपक्व और विस्तृत होगी, हम भेदभावों का बंधन उतने ही बेहतर रूप से दूर कर पायेगे। वास्तविक मित्रता वह जिसमे हम दूसरे जीव के प्रति चिन्ता का भाव रखे। यदि मैत्री भाव समाज में होगा तो ही सद्भाव की गंगोत्री बहती रहेगी। उक्त विचार आचार्य हर्ष सागर जी महाराज ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. शिवमंगलसिंह सुमन स्मृति पंचदश अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के शुभारंभ अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘सद्भाव मितिमैः सव्व भुवेषु (जीवमात्र के प्रति सद्भाव)  विषय पर व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यात संस्कृत विद् डाॅ. मोहन गुप्त ने ‘महाभारत का सामाजिक मर्म’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समकालिक सामाजिक परिस्थितियां मनुष्य को ऐसा काम करने के लिए मजबुर कर देती है। जो वह नहीं करना चाहता। यदि सद्भाव का गुण महाभारत काल में होता तो भयंकर विनाश टल सकता था। लोगों में प्रतिक्षा करने का धैर्य कम होता जा रहा है। फलस्वरूप समाज में अधर्म बड़ रहा है। हमारी नई पीढ़ी को हमारे नेैतिक मूल और संस्कारों को समझना बहुत आवश्यक है। महाभारत की कई घटनाऐं है जो हमें जीवन जीने के नए आयाम देती है। हमारा यह दायित्व है कि हम इन मूल्यों को युवा पीढ़ी तक पहुँचाए।
विषिष्ट अतिथि वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर थे। स्वागत उद्बोधन संस्था अध्यक्ष श्री कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह के प्रारभ में सद्भावना दीप प्रजवलित किया गया एवं विद्यालयीन छात्राओं द्वारा समारोह के आरंभ में सर्वधर्म प्रार्थना प्रस्तुत की गई। हमेशा की तरह प्रार्थना की विशेषता यह रही कि एक धर्म की छात्रा द्वारा किसी अन्य धर्म की प्रार्थना का वाचन किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। अतिथि स्वागत श्री प्रदीप जैन, श्री नवीन भाई आचार्य, श्री दिवाकर नातू, डाॅ. पिलकेन्द्र अरोरा, श्री एच.एल.महेश्वरी, श्री मथुरा प्रसाद शर्मा एवं कवि आनन्द जी ने किया। 
संचालन डाॅ. गिरीश पण्ड्या ने किया तथा आभार डाॅ. रश्मि शर्मा ने माना। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 7

09-Nov-2016,19:36:38,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

मानसिक शांति के बिना विष्वशांति संभव नहीं है - गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज
विष्वषांति के लिये हमें उसके मूल में जाना होगा और यह सोचना होगा कि उसका उद्गम कहाँ से हुआ ? विष्लेषण करने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि व्यक्ति यदि मानसिक रूप से शांत नहीं हैं तो विष्वषांति की बात करना बेमानी है क्योंकि व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही राष्ट्र या विष्व की कड़ी जुड़ती है। ऐसे में व्यक्ति का मन शांत होना विष्वषांति की प्रथम आवष्यकता है। स्वयं के भीतर शांति लाना एक साधना और एक तपस्या है। मानसिक रूप से प्रसन्न रहना हमें सीखना होगा। शांति सिर्फ घोषणाओं को करने से या जुलूस निकालने से नहीं आती है। यह सब तो औपचारिकता भर है। वास्तविक अहिंसा तो हमारे विचारों में या सोच में होना चाहिये। हमारी सोच अहिंसक तभी होगी जब हम संस्कारों को ग्रहण करेंगे और संस्कार हमेषा षिक्षा से मिलते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज की षिक्षा अहिंसा नहीं सीखा रही है। आज की षिक्षा तो सिर्फ स्पर्धा करना सीखाती है और वह भी अस्वस्थ स्पर्धा। स्पर्धाएँ हमेषा हिंसा को जनित करती है। ऐसे में हम संस्कार, सोच और अहिंसा की बात कहाँ से कर सकते है ? जिस दिन समाज में षिक्षक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका और कर्तव्य को समझेगा उस दिन विष्वषांति जरूर कायम होगी। वर्तमान में षिक्षक सिर्फ किताबी ज्ञान को पढ़ाना ही अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं जबकि होना यह चाहिये कि विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ मूल्यपरक षिक्षा प्रदान करें। हमारी संस्कृति सहअस्तित्व की संस्कृति है। इस संस्था में महाविद्यालय की छात्राओं के लिये भी ड्रेस कोड लागू किया गया है। यह स्वागत योग्य पहल है। इस निर्णय में अहिंसा की खुषबू है। हमें वह वातावरण निर्मित करना होगा जिससे युवा पीढ़ी अहिंसा युक्त समाज का निर्माण करें। जो बात मुझे पसंद नहीं है वह मैं दूसरों पर भी लागू नहीं करूँगा। यह सोच ही अहिंसा है। अहिंसा दो प्रकार की होती हैं एक व्यवहारिक अहिंसा और एक परमार्थिक अहिंसा। हमंें यह मंथन जरूर करना चाहिये कि हमने विगत वर्षों में क्या प्राप्त किया है और क्या गंवाया है ? उक्त विचार परम पूज्य गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज, अहमदाबाद ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के समापन दिवस के अवसर पर ‘अहिंसक समाज की रचना और विष्व शांति’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीष उच्च न्यायालय श्री वी.डी. ज्ञानी साहब ने ‘लोकमान्य तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में योगदान’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह युग प्रबंधन और प्रदर्षन का युग है। हमें इस युग में लोकमान्य तिलक को याद करना होगा। तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में विषेष योगदान है। तिलक ने अपने सषक्त लेखन से समाज को नई दिषा देने का कार्य किया है। लोकमान्य तिलक के लिये हमेषा से राष्ट्र सर्वोपरि रहा हैं और इसलिये उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोकहित के लिये समर्पित कर दिया था। ऐसे लोकमान्य तिलक का जीवन दर्षन युवा पीढ़ी तक पहुँचना बहुत आवष्यक है। यह हम सबका दायित्व है कि तिलक के विचारों को प्रसारित करने की दिषा में हम महती भूमिका अदा करें।
समारोह के विषिष्ट अतिथि श्री मुकुंद कुलकर्णी ने संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का प्रत्येक क्षण कीमती है। हमें प्रति पल विचारों का मंथन करके समाज हित के कार्य करते रहना चाहिये। वर्तमान में व्यक्ति आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध हो रहा है। यह प्रवृत्ति बदलना होगी। समाज में जितना हम प्राप्त कर रहे है उससे कई गुना हमें समाज को लौटाना होगा।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। 
अतिथि स्वागत डाॅ. अषोक पंडित, श्री रषीदउद्दीन एडवोकेट, श्री शैलेन्द्र पटवा, डाॅ. पारस मारू, श्री राहुल कटारिया, श्री ए.के. साकोरीकर, श्री सुधीर श्रीवास्तव, श्री महेन्द्र सिरोलिया, सुश्री शीला व्यास द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। समापन संध्या पर सद्भावना व्याख्यानमाला को सफल बनाने के लिये प्रयासरत समिति के सक्रिय कार्यकताओं का सम्मान भी किया गया। संचालन सुश्री अमृता कुलश्रेष्ठ ने किया। व्याख्यान की जानकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है।

Press Note Day 6

08-Nov-2016,19:20:21,व्याख्यानमाला Download Press Note : Download

गांधी विचार की उपेक्षा संपूर्ण दुनिया को भारी पड़ सकती है - श्री उमेष श्रीवास्तव
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शांति का जो मार्ग हम सभी को दिया हैं उसका कोई अन्य विकल्प नहीं है। शांति का मार्ग सिर्फ ‘‘शांति’’ ही हो सकता है। गांधी विचारों में वह शक्ति है जो विष्व की प्रत्येक समस्या का निदान कर सकती है। गांधी विचारों की उपेक्षा सम्पूर्ण दुनिया को भारी पड़ सकती है। युवा पीढ़ी के समक्ष हमने गांधी को ठीक ढंग से प्रस्तुत नहीं किया है। यही कारण हैं कि युवा पीढ़ी गांधी को सम्पूर्ण रूप से समझ नहीं पाई है। हम गांधी का चरखा चलाना और सूत काटना तो जानते हैं किंतु उनकी बताई हुई सहिष्णुता, प्रेम और अहिंसा की बातों को भूल गए है। यह ठीक इस प्रकार है कि हमने तंत्र को तो पकड़ लिया किंतु तत्व को भूल गए। श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में स्वयं कोई हथियार नहीं उठाए। आगे चलकर बुद्ध और महावीर ने भी अहिंसा और करूणा का संदेष हमें दिया और इसके बाद महात्मा गांधी का उदय हुआ जिन्होंने भी सम्पूर्ण विष्व को शांति का सन्मार्ग बताया। तकनीकी स्पर्धा ने प्रकृति को समाप्त कर दिया है। इससे तो बेहतर तब था जब मनुष्य गुफा में ही रहता था। उस वक्त वह प्रकृति से खिलवाड़ तो नहीं करता था। वर्तमान में हम युद्ध के बादल प्रतिदिन मंडराते हुए देखते हैं। यदि युद्ध होता हैं तो विकास धरा ही रह जाएगा। जीवन की बहुत छोटी बातें जो हमें ध्यान रखना चाहिये। जैसे षिक्षक यदि मेज को जोर से थपथपाकर या डांट फटकार लगाकर कक्षा में विद्यार्थियों को शांत करता है तो इसमें कोई शंका नहीं कि विद्यार्थियों में यह भाव आ जाएगा कि हिंसा से ही अपनी बात मनवाई जा सकती है। बच्चों को विद्यालय भेजते वक्त यदि माँ यह कहती हैं कि बेटा अपना लंच किसी को मत देना क्योंकि सब अपना लंच लेकर आते है। तो इससे बच्चे के मन में दूसरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की भावना कहाँ से आएगी ? कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह ‘सुमन’ की पंक्तियों ‘‘षिप्रा सा तरल सरल बहता हूँ’’ में बहुत बड़ा दर्षन छुपा है कि यदि जीवन में गति और लय है तो ही बहाव होगा। उन्हीं की पंक्ति ‘‘कालिदास की शेष कथा कहता हूँ’’ में दायित्व का भाव झलकता है। उक्त विचार अहमदाबाद के उमेष श्रीवास्तव जी ने भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित पद्मभूषण डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन स्मृति चतुर्दष अ.भा. सद्भावना व्याख्यानमाला के षष्ठम दिवस के अवसर पर ‘सामाजिक समरसता में युवाओं की भूमिका’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
विषिष्ट वक्ता के रूप में समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेमनारायण नागर ने कहा कि हमारी संस्कृति बहुत समृद्ध है। हमें इसे बिल्कुल भी नहीं खोने देना चाहिये। प्रत्येक संस्कृति की अपनी विषेषता होती हैं और साथ ही कुछ बुराईयाँ भी होती है। हमें सभी संस्कृतियों की अच्छाईयों को अपनाकर आगे बढ़ना चाहिये। यह बहुत ही दुखद हैं कि हम अपनी ही संस्कृति की विषेषता को भूल चले है।
स्वागत उद्बोधन संस्थाध्यक्ष श्री कृष्णमंगलसिंह कुलश्रेष्ठ ने दिया। समारोह का आरंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और कवि कुलगुरू डाॅ. षिवमंगलसिंह सुमन के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुआ। अतिथि स्वागत श्री मोहन नागर, श्री महेष कुमार सिंघल, श्री महेन्द्र शर्मा, श्री मोहसीन खान, श्रीमती अचला जौहरी, श्री शोभित दुबे द्वारा किया गया। अतिथियों का सम्मान शाॅल और श्रीफल से किया गया। संचालन प्रो. निरंजन कुमार बेलिया ने किया। व्याख्यान की जानकारी  वेबसाईट पर उपलब्ध है।

सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 09 नवम्बर के व्याख्यान
अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला में दिनांक 09 नवम्बर बुधवार को प.पू. गणिवर्य श्री रत्नकीर्ति विजय जी महाराज  साहब ‘अहिंसक समाज की रचना और विष्व शांति’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता करते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीष, उच्च न्यायालय श्री वी.डी. ज्ञानी साहब ‘लोकमान्य तिलक का स्वाधीनता आंदोलन में योगदान’ विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत करेंगे।

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